रिश्तों की गाड़ी और दो करोड़ की एक्सेसरीज़
आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?
India Ki Baat
आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?
डायल-अप की खटखट से लेकर 5G की बेचैनी तक—यह व्यंग्यात्मक लेख पीढ़ियों की उस यात्रा को पकड़ता है जहाँ रिश्ते तारों से जुड़े थे, सपने EMI पर चले और अब अस्तित्व चार्जिंग पॉइंट ढूँढ रहा है। Gen X की स्मृतियाँ, Gen Y की व्यावहारिकता, Gen Z की रील-हक़ीक़त और Gen Alpha की स्क्रीन-सभ्यता—सब एक कमरे में, एक ही नेटवर्क पर।
पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
हुक्का सिर्फ़ धुआँ नहीं छोड़ता, वह सदियों की जाति उगलता है। उसकी चिलम में तंबाकू नहीं, इतिहास सुलगता है। जिसका हुक्का, उसकी हवा— बाक़ी सब अपराधी साँसें। यह गीत लोक का नहीं, जन्म से थोपे गए पहचान का है।
असल में काम तो छोटा बाबू ही करता है, पर वाहवाही और माल ऊपर वालों के हिस्से। बाबूजी के जूते ही उनकी सबसे मजबूत ढाल थे—कोई पूछे तो जवाब मिल जाता, “कहीं काम से गए होंगे।” फाइल ढूंढना समुद्र से मोती निकालने जैसा बताया गया, ताकि मोती की क़ीमत भी वसूली जा सके। धीरे-धीरे कलेक्टर साहब भी समझ गए—इस शाही नौकरी में ज्यादा ईमानदारी से शुगर-बीपी ही मिलता है। इस तरह बाबूओं के जाल में जिले के सबसे बड़े बाबू सरकार भी सम्मिलित हो गए।
यह पुस्तक भारत के उस आदिवासी राबिनहुड की कथा है, जिसने जंगलों से निकलकर अंग्रेजी सत्ता और जमींदारी शोषण को खुली चुनौती दी। टंट्या मामा केवल योद्धा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी जननायक थे, जिनका जीवन जल-जंगल-जमीन के संघर्ष को समर्पित रहा। उपन्यास आदिवासी समुदाय की सामूहिक चेतना, साहस और न्यायप्रियता को सरल, रोचक और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करता है।
समय को हम एक सीधी रेखा समझते आए हैं—घड़ी की सुइयों, दिनों और वर्षों में बँटा हुआ। लेकिन श्रीमद्भागवत पुराण की राजा ककुद्मी की कथा इस धारणा को पूरी तरह उलट देती है। यहाँ समय एक नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है—हर लोक, हर आयाम और हर चेतना-स्तर का अपना समय है। कुछ क्षणों की प्रतीक्षा पृथ्वी पर करोड़ों वर्षों में बदल सकती है। यह लेख राजा ककुद्मी की कथा के माध्यम से वैदिक काल-गणना, चतुर्युग की अवधारणा और आधुनिक विज्ञान में समय-विलंब (Time Dilation) के सिद्धांत के बीच अद्भुत साम्य को उजागर करता है। यह केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी ब्रह्मांडीय लघुता का बोध कराने वाला गहन दार्शनिक अनुभव है।
भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई। यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।
बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”
यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।