लोकसमाज ने मकर संक्रांति को एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि सामूहिक भावबोध का पर्व बनाया

Priyanka Ghumara Jan 12, 2026 Culture 0

“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।” “लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।” “लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।” “परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”

मेरी हिन्दी -डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 11, 2026 हिंदी कविता 2

“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।” “तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।” “राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।” “अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”

जगत फूफा और फोन कॉल की विश्व राजनीति

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 10, 2026 व्यंग रचनाएं 0

दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी। एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन— न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।

युद्धोन्माद, बाज़ार और डीप स्टेट : सभ्यता के कगार पर खड़ी मानवता

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 10, 2026 समसामयिकी 0

“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।” “जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।” “हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।” “इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 10, 2026 Poems 0

यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है— क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है या रोज़ की साँस?

कागजों में मरण-

Ram Kumar Joshi Jan 9, 2026 व्यंग रचनाएं 1

मेरा बाप घर में मर गया, पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है। बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं— यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।

हवाओं से जंग और अज़्म की जीत

Shakoor Anvar Jan 8, 2026 गजल 0

तेज़ हवाओं और उग्र लहरों के बीच खड़ा मनुष्य जब हार मानने को होता है, तभी उसका अज़्म उसे जीवन की ओर लौटा लाता है। यह कविता द्वेष से मुक्त होकर, वफ़ा के सागर में एक नए जीवन-निज़ाम की कल्पना करती है।

सोशल मीडिया बैन पर किशोर मचाए शोर !

Prem Chand Dwitiya Jan 8, 2026 व्यंग रचनाएं 0

सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया। जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है। यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।