अभी न जाओ छोड़कर… — एक स्वर का अवसान
आशा भोंसले की आवाज़ केवल संगीत नहीं थी, वह समय की धड़कन थी। उनके जाने की खबर एक युग के अवसान जैसी है, लेकिन उनके गीत आज भी हर भावना में जीवित हैं।
India Ki Baat
आशा भोंसले की आवाज़ केवल संगीत नहीं थी, वह समय की धड़कन थी। उनके जाने की खबर एक युग के अवसान जैसी है, लेकिन उनके गीत आज भी हर भावना में जीवित हैं।
जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने लगें, तो न्याय, विश्वास और लोकतंत्र कैसे खोखले हो जाते हैं—इस गहन विश्लेषणात्मक लेख में संस्थागत विफलता, भ्रष्टाचार और सामाजिक पतन की पड़ताल।
पाँच राज्यों के 824 विधानसभा सीटों पर हो रहे चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि महँगाई, विकास और राजनीतिक बहुलवाद के बीच भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की बड़ी परीक्षा हैं।
क्या केवल संवैधानिक सुधार सदियों पुराने सामाजिक अन्याय को मिटा सकते हैं? डॉ. अंबेडकर के विचार हमें बताते हैं कि असली क्रांति कानून से नहीं, चेतना से शुरू होती है।
Today’s wars are no longer fought merely at borders—they are battles of supply chains, energy, technology, and narratives. In this complex global chessboard, India is emerging as a pivot state that is not only maintaining balance but is gradually reaching a position where it can influence the game itself.
यह कविता असभ्यता के शोर और सभ्यता की मौन शक्ति के बीच के द्वंद्व को उजागर करती है, जहाँ अंततः समय स्वयं निर्णय देता है कि स्थायी क्या है—अट्टहास या संवेदना।
ईरान, ताइवान, रूस और वेनेज़ुएला के बीच चल रहे वैश्विक तनाव के बीच भारत एक निर्णायक भूमिका में उभर रहा है, जहाँ संतुलन, रणनीति और कूटनीति ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
लायंस क्लब सार्थक की बीओडी बैठक में वर्ष 2026–27 के लिए नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई, जिसमें लायन उमेश शर्मा को अध्यक्ष, डॉ. चंद्रकांत सिंघल को सचिव और राजेश मंगल को कोषाध्यक्ष चुना गया।
रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
चीखें हवा में तैर रही थीं, पर सायरनों की आवाज़ ने उन्हें ढँक लिया—व्यवस्था का संगीत शुरू हो चुका था। लाशें लाइन में सजा दी गईं—मृत्यु के बाद भी अनुशासन लागू था। कैमरे तैयार थे, आँसू भी—बस ‘सीन’ सेट होना बाकी था। और अंत में वही वाक्य—“हालात काबू में हैं।”