डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
संस्मरण
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बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है।
जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है।
यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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प्रकृति के पास भी भाषा है—संकेतों, ध्वनियों और स्पर्श की।
लेकिन मनुष्य की भाषा उसे केवल बोलने की नहीं, अनुभव को सहेजने, तर्क रचने और सभ्यता बनाने की शक्ति देती है।
यह लेख भाषा को शब्द ब्रह्म, स्मृति, तर्क, न्याय और राज्य की जड़ के रूप में समझने का एक विचारोत्तेजक प्रयास है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है।
प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ?
यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 5, 2026
हिंदी कविता
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सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन,
जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता
मसखरी लेकर लौटे।
यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है,
जिनकी आवाज़ भारी है
और अर्थ हल्का।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
हास्य रचनाएं
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बचपन में लाइट जाना उत्सव था—कहानियाँ, तारे और परिवार।
आज लाइट जाए या ग्रिड फेल हो—ज़िंदगी स्क्रीन के सहारे चलती है।
यह कार्टून उसी बदलाव पर एक हल्का, चुभता और मुस्कराता व्यंग्य है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 4, 2026
Cinema Review
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अचानक मिला पैसा क्या सच में वरदान होता है, या वह इंसान की नैतिक नींव को भी हिला देता है?
छप्पर फाड़ के एक ऐसी फ़िल्म है, जो हँसाते-हँसाते आपको अपने भीतर झाँकने पर मजबूर कर देती है—बिना उपदेश दिए, सिर्फ़ सवाल छोड़कर।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 4, 2026
Cinema Review
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यह फ़िल्म सिर्फ़ एक केस की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज, क़ानून, धर्म और स्त्री-अधिकार के बीच खड़े असहज सवालों को सामने रखती है। हक वह सिनेमा है जो परदे पर नहीं, दर्शक के भीतर बहस शुरू करता है।
Wasim Alam
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है,
इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है।
AI जवाब दे रहा है—
पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है।
जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है।
यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।