डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
समसामयिकी
0
“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।”
“जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।”
“हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।”
“इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
Poems
0
यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर
दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है—
क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है
या रोज़ की साँस?
Prahalad Shrimali
Jan 9, 2026
हिंदी कविता
0
कभी कच्चा केला, कभी पका आम—
बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में
हर रिश्ता, हर मूल्य
अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 9, 2026
व्यंग रचनाएं
1
मेरा बाप घर में मर गया,
पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है।
बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं—
यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।
Shakoor Anvar
Jan 8, 2026
गजल
0
तेज़ हवाओं और उग्र लहरों के बीच खड़ा मनुष्य जब हार मानने को होता है,
तभी उसका अज़्म उसे जीवन की ओर लौटा लाता है।
यह कविता द्वेष से मुक्त होकर, वफ़ा के सागर में
एक नए जीवन-निज़ाम की कल्पना करती है।
Prem Chand Dwitiya
Jan 8, 2026
व्यंग रचनाएं
0
सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया।
जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है।
यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 7, 2026
Cinema Review
0
यह लेख फिल्म स्वामी को कथानक, अभिनय या संगीत से आगे ले जाकर एक सामाजिक विमर्श के रूप में देखता है—जहाँ स्त्री-स्वतंत्रता, विवाह और निर्णय-स्वातंत्र्य टकराते हैं। यह समीक्षा उस अनुभव की तरह है, जो फिल्म देखने के बाद मन में चलता रहता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
संस्मरण
0
बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
आलोचना ,समीक्षा
0
सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है।
जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है।
यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
आलोचना ,समीक्षा
0
प्रकृति के पास भी भाषा है—संकेतों, ध्वनियों और स्पर्श की।
लेकिन मनुष्य की भाषा उसे केवल बोलने की नहीं, अनुभव को सहेजने, तर्क रचने और सभ्यता बनाने की शक्ति देती है।
यह लेख भाषा को शब्द ब्रह्म, स्मृति, तर्क, न्याय और राज्य की जड़ के रूप में समझने का एक विचारोत्तेजक प्रयास है।