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“एक व्यंग्यकार की टेबल पर खुली रखी पुस्तक ‘व्यंग्य—कल, आज और कल’, बगल में चश्मा, पेन और पीले प्रकाश में रखा कॉफी मग; साहित्यिक अध्ययन और आलोचना के वातावरण को दर्शाती शांत, बौद्धिक छवि।”

व्यंग्य—कल, आज और कल : हिंदी व्यंग्य का व्यापक परिप्रेक्ष्य और बौद्धिक पुनर्स्थापन

“समोसा सिर्फ नाश्ता नहीं—भारतीय समाज, राजनीति और प्रेमकथाओं का सबसे स्थायी त्रिकोण है। डॉक्टर से लेकर दफ़्तर और दाम्पत्य तक, हर मोड़ पर यह तला-भुना…

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“लाइन-आर्ट कार्टून कैरीकेचर जिसमें एक गोलमटोल डॉक्टर हाथ में तिकोना समोसा उठाए हँस रहा है; पीछे सरकारी दफ़्तर के बाबू समोसा देखते ही फाइलें हिलाने लगते हैं; एक उदास बर्गर कोने में मेयोनेज़ से घावों पर मरहम लगा रहा है; शादी-ब्याह का पंडाल और ‘शालू’ नाम की लड़की समोसे की ओर प्रेम से देखती दिखाई देती है।”

समोसे का सार्वभौमिक सत्य

“समोसा सिर्फ नाश्ता नहीं—भारतीय समाज, राजनीति और प्रेमकथाओं का सबसे स्थायी त्रिकोण है। डॉक्टर से लेकर दफ़्तर और दाम्पत्य तक, हर मोड़ पर यह तला-भुना…

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Vintage-style monochrome portrait of Begum Akhtar seated gracefully in a traditional Lucknowi saree, eyes half-closed as if lost in a ghazal, soft stage lighting highlighting her expressive face, capturing the melancholic depth and royal elegance of Mallika-e-Ghazal.

बेग़म अख़्तर : सुरों की मलिका

बेग़म अख़्तर—एक नाम जो सिर्फ़ संगीत नहीं, दर्द, रूह और नफ़ासत का दूसरा नाम है। फैज़ाबाद की एक हवेली से शुरू होकर लखनऊ की महफ़िलों…

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A stylized artistic portrait of Satyajit Ray, tall and thoughtful, holding a camera, with soft vintage lighting, Kolkata street silhouettes, and cinematic frames floating around him.

सत्यजीत रे: वह आदमी जिसने सिनेमा की आँखों में आत्मा भर दी

सत्यजीत रे केवल निर्देशक नहीं थे—एक दर्शन, एक दृष्टि, एक शांत चमत्कार। उनकी फिल्मों ने सिनेमा को कहानी से मनुष्य बना दिया और दुनिया को…

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“एक भारतीय शादी के पंडाल में तंदूर के सामने लंबी, ठुंसी हुई कतार लगी है। हाथ में खाली प्लेट लिए लोग तंदूरी रोटी के इंतज़ार में धक्कामुक्की करते दिख रहे हैं। सबसे आगे एक दृढ़ निश्चयी ‘वीर’ युवक तंदूर से почти चिपककर खड़ा है, पीछे से लोग उसे धकेल रहे हैं, पर वह प्लेट आगे बढ़ाए अडिग खड़ा है, मानो रोटी नहीं, विजय पताका लेने आया हो।”

तंदूरी रोटी युद्ध: वीर तुम डटे रहो

“शादी के पंडाल में तंदूरी रोटी अब सिर्फ़ खानपान नहीं रही, पूर्ण युद्ध बन चुकी है। दूल्हे से ज़्यादा चर्चा उस वीर की होती है,…

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"एक भव्य, हल्की रोशनी वाले पॉश बंगले का अंदरूनी दृश्य, जहाँ सजे-धजे लेखक, कवि और बौद्धिक लोग वाइन ग्लास हाथ में लिए ऊपरी शिष्टता और भीतरी खोखलेपन के साथ बातचीत में लगे हैं। कमरे में महंगी पेंटिंग्स, कांचों की खनखनाहट और नक़ाबपोश मुस्कानें फैली हैं; और इस चमकदार भीड़ के बीच एक अदृश्य, अनुपस्थित कवि—अमृत—की मौजूदगी का भारी बोझ माहौल को असहज बनाता है।"

पार्टी’: एक बंगले में कैद पूरा समाज

“गोविंद निहलानी की ‘पार्टी’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, उच्चवर्गीय बौद्धिकता का एक्स-रे है। चमकते बंगले में इकट्ठा लोग साहित्य से ज़्यादा एक-दूसरे की पॉलिश चमकाते…

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A golden cosmic figure symbolizing ‘Purusha’ floats in deep space, surrounded by nebula clouds and galaxies, with glowing Vedic symbols and radiant consciousness threads connecting to the universe.

पुरुष सूक्त और सृष्टि–चिन्तन : पर्यवेक्षक की चेतना में जन्मा ब्रह्मांड

“पुरुष सूक्त हमें बताता है कि ब्रह्मांड कोई जड़ मशीन नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रेक्षक की चेतना में जागता हुआ दृश्य है, जिसके ‘सहस्र सिर’…

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“ब्रह्मांड के आरंभ का प्रतीक—एक चमकता हुआ स्वर्ण-अंडाकार प्रकाश-गोला, जिसके चारों ओर घूमती आकाशगंगाएँ, धुंधले नेब्यूला बादल और ऊर्जा की लहरें बह रही हैं। केंद्र में मौजूद ‘हिरण्यगर्भ’ एक धड़कते हुए सूर्य-बीज जैसा दिख रहा है, जिससे प्रकाश की पतली धाराएँ ब्रह्मांड में फैल रही हैं।”

हिरण्यगर्भ का रहस्य : सृष्टि से पहले के अंधकार में चमकती एक स्वर्ण-बूँद

“जब कुछ भी नहीं था—न आकाश, न पृथ्वी—तब भी एक चमकता बीज था, ‘हिरण्यगर्भ’। यही वह आदिम स्वर्ण-कोष है, जहाँ ब्रह्मांड समय और स्थान बनने…

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“पुराने जमाने के सिनेमा हॉल का भीड़भाड़ वाला दृश्य—आगे की सीटों पर बैठे बच्चे गद्दी की रुई निकालते हुए, बीच में घूमते चाय-कुल्फी-पापड़ वाले विक्रेता, खुले आँगन वाले सामूहिक वॉशरूम का अव्यवस्थित दृश्य, दीवारों पर तंबाकू की पिचकारी से बने एब्सट्रैक्ट निशान, और बाहर चमकती धूप में आँखें मिचमिचाते दर्शक—एक व्यंग्यात्मक, नॉस्टेल्जिक भारतीय सिनेमा संस्कृति को दर्शाते हुए।”

भारतीय सिनेमा जगत — जाने कहाँ गए वो दिन

“सिनेमाघर कभी मनोरंजन का देवालय था, जहाँ चाय-कुल्फी की आवाजें, तंबाकू की पिचकारियाँ, आगे की सीटों की रुई निकालने की परंपरा और इंटरवल का महाभारत—सब…

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