डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 1, 2026
ललित निबंध
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चिट्ठियों का वह दौर, जब नीली स्याही में रिश्तों की गर्माहट होती थी, डाकिए का इंतज़ार एक उत्सव होता था और एक काग़ज़ पूरे घर की खुशबू साथ ले आता था। आज की तेज़ डिजिटल दुनिया में आइए याद करें चिट्ठी-पाती के उसी आत्मीय ज़माने को।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 28, 2026
ललित निबंध
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टाइम ट्रैवल का सपना हर आदमी ने कभी-न-कभी देखा है—काश अतीत में जाकर दो-चार गलतियाँ सुधार आते। लेकिन ब्रह्मांड कोई तहसील का बाबू नहीं कि पुरानी फाइल में नई नोटशीट लगाकर मामला निपटा दे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 27, 2026
ललित निबंध
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आम कोई आम फल नहीं जी। खासकर हम जैसे डायबिटीज़ के मारे लोगों के लिए आम वैसा है जैसे सामने महबूबा खड़ी हो—महकती, मुस्कराती, रस टपकाती—और हम ग्लूकोमीटर की अदालत में अपराधी की तरह खड़े हों।