ईरान युद्ध से बहुध्रुवीय दुनिया का मार्ग हुआ मज़बूत
ईरान युद्ध के बाद चीन, रूस और ईरान का बढ़ता रणनीतिक सहयोग केवल पश्चिम एशिया का समीकरण नहीं बदल रहा, बल्कि अमेरिकी प्रभुत्व से अलग एक बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था के निर्माण को भी गति दे रहा है।
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लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूलअवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपनेप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती […]
भारतीय लोकतंत्र में मतदाता अब केवल परंपरागत राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक ध्रुवीकरण और जनसमस्याओं के समाधान की कमी ने नागरिकों को नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आम आदमी पार्टी, टीवीके और सोशल मीडिया आधारित अभियानों की लोकप्रियता इसी बदलती जनभावना का संकेत है। यह लेख भारतीय मतदाता की मनोवृत्ति, राजनीतिक विश्वास के संकट और लोकतंत्र में उभरते नए विकल्पों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है। यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वायत्तता, मीडिया की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।
हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास में महिलाओं की भागीदारी अब भी बेहद सीमित है। यह लेख हिंदी मीडिया में महिला पत्रकारों की स्थिति, नेतृत्व में असमानता, लैंगिक पूर्वाग्रह और बदलाव की संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है? जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, सतत विकास, जल संरक्षण, जंगल, ऊर्जा और भारत के भविष्य पर आधारित विस्तृत हिंदी लेख पढ़ें।
21वीं सदी में जहाँ तकनीकी प्रगति नई ऊँचाइयों को छू रही है, वहीं अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि विकास के मॉडल को अस्थिर कर रही है। यह लेख उत्तरदायी अभिभावकत्व और स्वैच्छिक जनसंख्या नियंत्रण के माध्यम से संतुलित और टिकाऊ भविष्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
“कार्ड हाथ में है, भरोसा दिल में है—लेकिन इलाज फाइलों में अटका हुआ है। ‘खाली वायदों का कार्ड’ एक ऐसा व्यंग्य है जो स्वास्थ्य योजनाओं के पीछे छिपी सच्चाई को बेनकाब करता है।”
भारत में डिजिटल क्रांति ने जहां अवसर दिए, वहीं एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी—डिजिटल लत। यह लेख बताता है कि कैसे स्क्रीन के बढ़ते समय ने बच्चों, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।
भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, फिर भी वैश्विक रैंकिंग में वह छठे स्थान पर खिसक गई—यह विरोधाभास केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि विकास, वितरण और वास्तविक समृद्धि की गहरी कहानी है।