डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 13, 2026
Culture
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शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 29, 2026
Art and Craft
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भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई।
यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।
Priyanka Ghumara
Jan 12, 2026
Culture
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“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।”
“लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।”
“लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।”
“परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
Culture
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यह व्यंग्यात्मक चिट्ठी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की उन इच्छाओं का दस्तावेज़ है, जो सरकारों, बैंकों और व्यवस्थाओं से निराश होकर सीधे सांता क्लॉज़ तक पहुँचती हैं। मोज़ों से लेकर स्विस अकाउंट, बिजली बिल से लेकर बॉस की मीटिंग तक—यह रचना हास्य, विडंबना और करुणा के बीच झूलती एक सच्ची सामाजिक तस्वीर पेश करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 22, 2025
Culture
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ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं।
वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की।
जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है।
शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 15, 2025
Culture
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वंदे मातरम कोई साधारण गीत नहीं है—यह वह ध्वनि है जो कभी कोड़ों की मार के बीच भी गूंजती थी और आज बहसों के शोर में दबाई जा रही है। इसके 150 वर्ष हमें यह याद दिलाते हैं कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, स्मृतियों से बनता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 11, 2025
Culture
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सर्दियों की पहली ठंड आते ही खीच की महक घर-आँगन में फैल जाती है। राजस्थान का यह देसी व्यंजन सिर्फ भोजन नहीं, एक सामुदायिक परंपरा, एक सर्दियों का उत्सव और तीन पीढ़ियों से चली आ रही रसोई की विरासत है। तिल के तेल, सोडा बाईकार्ब और हाथ से खाने की रस्म इसमें एक ऐसा स्वाद जोड़ते हैं जिसे केवल खाया नहीं, महसूस किया जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 1, 2025
Culture
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आज गीता जयंती है—वह दिन जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जन्मा कृष्ण का अमर संदेश मानवता को मार्ग दिखाता है। भय, दुविधा और मोह से जूझते अर्जुन को मिला यह उपदेश आज भी हर मनुष्य के भीतर के संघर्ष को दिशा देता है। गीता केवल ग्रंथ नहीं, जीवन का शाश्वत प्रकाश है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 21, 2025
Culture
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भारत के जनजातीय समुदायों का पारम्परिक पर्यावरण विज्ञान प्रकृति के साथ उनके जीवित, गहरे और सर्जनात्मक संबंध को व्यक्त करता है। मौसम, जंगल, जल, बीज और पशु-पक्षियों के व्यवहार को पढ़ने की उनकी क्षमता अद्भुत है। उनका ज्ञान तकनीक नहीं—अनुभव, आध्यात्मिकता और सामुदायिक विवेक का परिणाम है। आज IPCC और UNESCO इसे जलवायु अनुकूलन और सतत भविष्य का वैश्विक स्तम्भ मानते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 31, 2025
Culture
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गोपाष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ों का उत्सव है — वह दिन जब हम यह स्मरण करते हैं कि हमारी संस्कृति, हमारी खेती, और हमारा जीवन — सब गो के उपकार पर टिका है। गोबर से लीपे आँगन, दूध से पोषित पीढ़ियाँ और बैल से चलती हल की रेखाएँ — यही तो भारत का असली तंत्र है।