चार-दीवारी के भीतर-कविता रचना
चार दीवारों के भीतर धीरे-धीरे गलता जीवन, और बाहर चमकता ताला— संस्कार ज़िंदा थे, बस माता-पिता नहीं रहे।
चार दीवारों के भीतर धीरे-धीरे गलता जीवन, और बाहर चमकता ताला— संस्कार ज़िंदा थे, बस माता-पिता नहीं रहे।
यह कविता जीवन की उस रहस्यमय दिशा की तलाश है, जहाँ कोई पदचिन्ह नहीं और कोई उत्तर नहीं। कवि उस अज्ञात छोर की ओर देखता है, जहाँ जीवन कभी मुस्कराता, कभी मौन चलता चला जाता है। यह आत्ममंथन की यात्रा है — जिसमें कवि न केवल जीवन को खोजता है, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न करता है। हर पंक्ति एक सूक्ष्म पीड़ा को उद्घाटित करती है, जहाँ जीवन का मौन गूंजता है। कविता एक प्रतीक है उस क्षण का, जब मनुष्य समझना चाहता है — क्या सच में जीवन कुछ कहे बिना ही चला जाता है, और पीछे छोड़ जाता है... एक खालीपन।