“सिसकियों से स्वर तक”-कविता रचना
यह कविता स्त्री की आंतरिक वेदना से उपजे साहस की गाथा है। रुदन और मौन के बीच खड़ी वह स्त्री, जो अब हार नहीं, संकल्प धारण करती है। आँसुओं को छोड़, आत्मविश्वास का दुशाला ओढ़ती है। यही उसकी नई पहचान है — परिवर्तन की ओर बढ़ती, एक जाग्रत चेतना।