ईश्वरीय अस्तित्व –भ्रम, भरोसा या बौद्धिक आलस्य?
ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं। वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की। जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है। शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।