डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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प्रकृति के पास भी भाषा है—संकेतों, ध्वनियों और स्पर्श की।
लेकिन मनुष्य की भाषा उसे केवल बोलने की नहीं, अनुभव को सहेजने, तर्क रचने और सभ्यता बनाने की शक्ति देती है।
यह लेख भाषा को शब्द ब्रह्म, स्मृति, तर्क, न्याय और राज्य की जड़ के रूप में समझने का एक विचारोत्तेजक प्रयास है।
Pawan Ghumara
Dec 29, 2025
Blogs
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“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।”
“फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।”
“लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
हिंदी लेख
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हिंदी दिवस कोई स्मृति-लेन नहीं, आत्मगौरव का वार्षिक एमओयू है—जिसमें हम तय करें कि अदालत, विज्ञान, स्टार्टअप और दफ्तर की फाइल तक हिंदी का सलीका पहुँचे। भाषा मैनेज की जा सकती है, नियंत्रित नहीं; वह बारात है—जहाँ रोकोगे, वहीं ऊँची ‘हुर्र’ निकलेगी। एआई के युग में भी संवेदना की मुद्रा इंसान ही छापता है; इसलिए हिंदी को रोज़मर्रा, रोज़गार और रोज़दिल में उतारना होगा। यही उसका असली दिवस, कंठ का।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख
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हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।