डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 20, 2026
संस्मरण
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“मैं तेज़ नहीं हूँ, न आधुनिक—पर मैंने चलना सिखाया है।
मेरे चक्रों पर समय नहीं, स्मृतियाँ घूमती हैं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 30, 2025
Lifestyle
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हम बच्चे के हाथ में खिलौना नहीं, भविष्य थमा देते हैं।”
“शरारत दोष नहीं, जीवन की पहली प्रयोगशाला है।”
“थोपे गए संस्कार अनुशासन पैदा करते हैं, चेतना नहीं।”
“गलती न करने का अभिनय, गलती करने से ज़्यादा अनैतिक है।”
“जिस बचपन में शरारत मर जाती है, उस जीवन में साहस कभी जन्म नहीं लेता।”
Wasim Alam
Aug 16, 2025
लघु कथा
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"15 अगस्त के उत्सव में झंडे लहरा रहे थे, गीत बज रहे थे, लेकिन गांधी मैदान के किनारे नंगे पाँव बच्चे लकड़ी समेट रहे थे। उनके चेहरों पर डर और भूख लिखी थी। असली आज़ादी तब होगी जब बच्चे छत के लिए लकड़ी नहीं, सपनों के लिए कलम तलाशेंगे।"
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 4, 2025
Poems
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समय की धारा में बहते हुए रिश्तों का यह मार्मिक चित्रण है — जहाँ कभी हँसी-ठिठोली, सपनों की साझेदारी और चाय की चौपाल थी, वहाँ अब दिखावटी पोस्ट और व्यस्तताएँ हैं। 'दोस्त बदल गए हैं यार' न केवल एक वाक्य है, बल्कि एक पीढ़ी की सामूहिक टीस है, जो अपनी जड़ों की तलाश में आज भी पलटकर देखती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 30, 2025
Poems
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यह कविता एक बच्चे की अंतरात्मा की पुकार है—जो केवल अपने लिए जीना चाहता है, किसी की महत्वाकांक्षा की ट्रॉफी बनकर नहीं। वह अपने सपनों को जीना चाहता है, न कि दूसरों के अधूरे सपनों को ढोना। उसमें संवेदना है, विद्रोह है और मानवता की गूंज है।