बजट और बसंत : एक राग, कई रंग

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 6, 2025 व्यंग रचनाएं 1

बजट और बसंत का यह राग अब प्रकृति से नहीं, सत्ता की चौंखट से संचालित होता है। सत्ता पक्ष ढोल-ताशे के साथ लोकतंत्र के मंडप में राग बजट-भरतार गा रहा है, जबकि आम आदमी खाली थाली में चटनी की एक बूंद देखकर संतोष कर रहा है। गरीब अपने मरसिये में बजट को मज़ाक बता रहा है — एक सड़ा हुआ राग, जिसे हर साल दोहराया जाता है।