डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 18, 2025
व्यंग रचनाएं
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धनतेरस के शुभ अवसर पर जब जेबें खाली हैं और बाज़ार भरा पड़ा है, तब लेखक हंसी और व्यंग्य से पूछता है — “धनतेरस किसके लिए शुभ है?” यह रचना बताती है कि असली उल्लू कौन है — वह जो लक्ष्मी जी के साथ उड़ता है या वह जो उनकी प्रतीक्षा में खाली वॉलेट थामे बैठा है। हास्य, कटाक्ष और सटीक सामाजिक टिप्पणी से भरा व्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 9, 2025
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बेवकूफ बनना कोई साधारण काम नहीं, यह भी एक कला और तपस्या है, जिसमें सामने वाले को यह आभास भी न हो कि आप अभिनय कर रहे हैं। यह समझदारी का मुखौटा पहनकर मूर्ख दिखने की युक्ति है। हर कोई जन्मजात बेवकूफ नहीं होता, बल्कि कई बार जो दूसरों को बेवकूफ बना रहा होता है, वही सबसे बड़ा बेवकूफ सिद्ध हो जाता है। आजकल के घोटाले, फ्रॉड और योजनाएँ इसी बेवकूफी की ज़मीन पर फलते-फूलते हैं। लोकतंत्र में तो वोट तभी मिलते हैं जब मतदाता को बेवकूफ बनाए रखा जाए। बाज़ार में 'वन गेट वन फ्री' जैसे ऑफर इसी मानसिकता का हिस्सा हैं। सनातन काल में भी देवताओं को मोहिनी अवतार लेना पड़ा था — यानी तब भी यह कला प्रचलित थी। अतः प्रस्ताव है कि “राष्ट्रीय मूर्ख आयोग” की स्थापना की जाए, क्योंकि अब नीतियाँ यही कहती हैं: "समझदारी सवाल उठाती है, समाधान तो बेवकूफी ही देती है।" जय बेवकूफी! जय भारत!