चार-दीवारी के भीतर-कविता रचना डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 29, 2025 हिंदी कविता 0 चार दीवारों के भीतर धीरे-धीरे गलता जीवन, और बाहर चमकता ताला— संस्कार ज़िंदा थे, बस माता-पिता नहीं रहे।