डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।”
यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 14, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब हनुमान जी चुनाव लड़ने पहुँचे, तो उन्हें सबसे बड़ा संकट रावण नहीं, बल्कि ‘जाति’ कॉलम में मिला। यह व्यंग्य भारतीय लोकतंत्र के उस कटु सत्य को उजागर करता है, जहाँ इंसानियत से पहले जाति पूछी जाती है।
Dr Shailesh Shukla
Apr 12, 2026
हिंदी लेख
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जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने लगें, तो न्याय, विश्वास और लोकतंत्र कैसे खोखले हो जाते हैं—इस गहन विश्लेषणात्मक लेख में संस्थागत विफलता, भ्रष्टाचार और सामाजिक पतन की पड़ताल।
Dr Shailesh Shukla
Apr 5, 2026
India Story \बात अपने देश की
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सोशल मीडिया ने एक देश में कई समानांतर वास्तविकताएँ बना दी हैं
एल्गोरिद्म हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं
झूठी खबरें सच्चाई से तेज़ फैलती हैं
डिजिटल ध्रुवीकरण लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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“भाइयो-बहनो, आज अगर हम रपट जाएँ… तो हमें न उठइयो।” लोकतंत्र के इस विचित्र महोत्सव में हर वर्ग अपनी-अपनी शैली में फिसल रहा है—कोई वादों पर, कोई सच्चाई पर, कोई सिद्धांत पर… और आम आदमी, वह तो रोज़ की आदत से फिसल ही रहा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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लोकतंत्र की डाल पर हम खड़े नहीं हैं,
अपनी-अपनी पूँछ से लटके हुए हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 6, 2026
हिंदी कविता
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“रास्ते मिल गए हैं,
पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।”
“हम आगे इसलिए नहीं बढ़े
कि सबको साथ ले जाएँ,
बल्कि इसलिए
कि पीछे छूटे लोग
दिखाई न दें।”
“वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए—
लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 19, 2026
Self Help and Improvements
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भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा मन है—साहसी, आकांक्षी और साफ़ दिल वाला। राष्ट्र-निर्माण केवल सड़क-पुल नहीं, मूल्यों और चरित्र का निर्माण है। जब युवा सेवा, उद्यमिता और नीति-भागीदारी से जुड़ते हैं, तो भविष्य आकार लेता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया।
सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने।
आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था।
दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है।
लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।
Pawan Ghumara
Dec 29, 2025
Blogs
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“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।”
“फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।”
“लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”