डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 4, 2025
व्यंग रचनाएं
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देवराज इंद्र की सभा के बीच अचानक नारद मुनि माइक्रोफोन लेकर प्रकट होते हैं और देवताओं को बताते हैं कि अब असली अमृतकाल मृत्युलोक में चल रहा है—जहाँ मानव ने देवों से भी बड़ी कला सीख ली है, रूप बदलने की। एक ओर देवता नृत्य और सोमरस में मग्न हैं, तो दूसरी ओर मानव मोबाइल कैमरे से लाशों की तस्वीरें खींचकर “मानवता शर्मसार” का ट्रेंड बना रहा है। व्यंग्यपूर्ण संवादों और पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से यह रचना बताती है कि जब मानवता ही मर जाए, तो अमरत्व भी व्यर्थ है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 18, 2025
Blogs
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दोस्ती अमृत है, मगर उधार की चिपचिपाहट इसे छाछ बना देती है। वही दोस्त जो आपकी माँ का हाल पूछता था, अचानक आपकी क्रेडिट कार्ड लिमिट साफ़ कर देता है। रिकवरी के लिए आप गुड मॉर्निंग भेजते हैं और जवाब का इंतज़ार वैसा ही करते हैं जैसे पहले क्रश के ‘हम्म्म’ का। और जब वह अंडरग्राउंड हो जाए, तो समझिए आपकी दोस्ती अब एक व्हाट्सऐप ग्रुप की भावनात्मक कर्ज़ बैठक बन चुकी है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 2, 2025
व्यंग रचनाएं
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डिजिटल युग की हंसी अब मुँह से नहीं, मोबाइल से निकलती है। पिता ‘LOL’ सुनकर असली हंसी देखना चाहते हैं, जबकि बेटा ‘BRB’, ‘ROFL’, ‘IDK’ जैसे कोड में ही भावनाएँ व्यक्त कर देता है। व्यंग्य यह है कि असली संवाद खो गया है और अब हंसी भी इमोजी व शॉर्टकट पर आउटसोर्स हो गई है। यही है हमारी पीढ़ियों का नया “लाफ्टर क्लब”—ऑनलाइन!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 5, 2025
हिंदी लेख
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"लेखन जब रियाज़ बन जाए, तो समाज उसे शौक समझने लगता है और गुटबाज़ी उसे अयोग्यता का तमगा पहनाने लगती है। एक डॉक्टर होकर सतत सृजन करना बहुतों को पचता नहीं। आत्म-संतुष्टि और गुट की तालियों के बीच जूझता लेखक जब बिना पढ़े प्रशंसा सुनता है, तो रचना की पीड़ा और भी गहरी हो जाती है। यही आत्म-संघर्ष है — एक लेखक की रचना प्रक्रिया का सच्चा यथार्थ, जहाँ वह लगातार खुद से लड़ता है, फिर भी लिखता है, क्योंकि यह उसका रियाज़ है… उसका आत्मसुख।"