आजाद गजल-देश पर एहसान उनके

Prahalad Shrimali Sep 21, 2025 हिंदी कविता 0

“आजाद ग़ज़ल” जीवन, समाज और राष्ट्र के विरोधाभासों का जीवंत चित्र खींचती है। माँ की गोद में मासूमियत है तो जंगलों के कटने पर पत्तों का प्रतिरोध भी। सूरज क्रोध में है, धरती धधक रही है, राजनीति अपने होश में है और सैनिक मौन प्रहरी की तरह खड़ा है।

कचरा गाथा: नाली के सम्राटों की जंग!

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 21, 2025 Blogs 0

सुबह की ताज़ी हवा और गालियों की महक—यही हमारी कॉलोनी का ‘नियम’ है। इस बार झगड़े की वजह बनी नाली में बहाया गया कचरा। एक परिवार ने रंग और खानपान का हवाला दिया, तो दूसरे ने संस्कारों की दुहाई। मोहल्ला जुटा, चायवाले ने विशेषज्ञ राय दी। मैं सोच रहा था—डीएनए टेस्ट करवा दूँ! लेकिन श्रीमती जी ने रोक दिया—“अरे, थोड़ी देर में यही लोग चीनी माँगने पहुँच जाएँगे।”

किराएदार की व्यथा: एक हास्य-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 16, 2025 Blogs 0

इस रचना में किराएदार की ज़िंदगी की उन अनकही व्यथाओं को हास्य और व्यंग्य के लहज़े में उजागर किया गया है, जिन्हें हम सभी कभी न कभी भुगत चुके हैं। मकान मालिक की एक्स-रे दृष्टि, दूध की बाध्यता, रद्दी की एफडी और ‘बेटे समान’ किराएदार बनने की त्रासदी — सबकुछ इतने रोचक ढंग से बुना गया है कि हँसी के साथ एक टीस भी उभरती है।

गालियों का बाज़ार

डॉ मुकेश 'असीमित' May 22, 2025 Blogs 0

“गालियों का बाज़ार” नामक उस लोकतांत्रिक तमाशे का प्रतीक है जहाँ भाषाई स्वतंत्रता के नाम पर अपशब्दों की होड़ है। हर कोई वक्ता है, हर गाली एक ब्रांड। संविधान की आड़ में तर्क नहीं, तापमान बढ़ाया जा रहा है। यह व्यंग्य मौजूदा सोशल-मीडिया और राजनीति की भाषा पर करारा प्रहार है।