बचा हुआ लोकतंत्र | वोट, जनता और सत्ता पर तीखा राजनीतिक व्यंग्य

Pradeep Audichya Jun 23, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बचा हुआ लोकतंत्र,, – लोकतंत्र किसके पास है ? ये प्रश्न मंच ने नीचे भरी सभा में फेंका ।इतनी जोर से फेंका कि तंत्र द्वारा घेरकर लाए गए लोक ( लोग) डर गए। लोग सोचने लगे शायद कुछ चोरी हो गया और इसका इल्ज़ाम हमपर आयेगा ।सभा में लोग एक दूसरे को संदेह की निगाह […]

राम, बाहर तो निकल! | कोचिंग हादसों और सिस्टम की नाकामी पर तीखा व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 23, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बरसात में कोचिंग के तहखाने पानी से भर जाते हैं, गर्मी में बंद इमारतें आग का गोला बन जाती हैं और जर्जर स्कूलों की छतें बच्चों के सिर पर गिरती हैं। दुर्घटना के बाद मुआवजा, बयान और जाँच समिति तैयार मिलते हैं—सिर्फ जवाबदेही नहीं मिलती। इसी संवेदनहीन व्यवस्था पर करारा प्रहार है व्यंग्य रचना—“राम, बाहर तो निकल!”

कागजों में मरण-

Ram Kumar Joshi Jan 9, 2026 व्यंग रचनाएं 1

मेरा बाप घर में मर गया, पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है। बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं— यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।

सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला है —व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 26, 2025 Blogs 7

एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?