डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 17, 2025
व्यंग रचनाएं
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भगवान के पास और कोई काम नहीं? हर परेशानी पर लोग इतना ही कहते हैं—धैर्य रखो, भगवान परीक्षा ले रहे हैं…मानो ऊपर कोई परीक्षा बोर्ड बैठा हो, और हम सब उसके आजीवन परीक्षार्थी हों।”
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“हर आदमी का प्रश्नपत्र अलग—न टाइम टेबल, न सिलेबस, न नोटिस। बस सुबह उठो और पता चले—भगवान ने आज पॉप क्विज रख दी है!”
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“पड़ोसी, रिश्तेदार, सलाहवीर—सबको लगता है भगवान ने सवाल-पत्र इन्हीं से पूछा है। खुद के पेपर तकिये के नीचे छुपाएँगे, पर दूसरों की कॉपी में झाँकना नहीं छोड़ेंगे!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं—क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। उनका आदर्श वाक्य है — “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।”
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जहाँ नेता प्रचार से मशहूर होते हैं, वहाँ कंजूस बिना खर्च के ही चर्चा में रहते हैं। मोहल्ले की चाय की थड़ियों पर उनके नाम के किस्से चलते हैं।
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कहते हैं, ये लोग लंबी उम्र जीते हैं — शायद इसलिए कि ज़िंदगी भी बहुत संभालकर खर्च करते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 5, 2025
Book Review
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‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ एक बहुआयामी व्यंग्य संग्रह है जिसमें डॉ. मुकेश असीमित ने समाज, राजनीति, शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों की विसंगतियों को पैनी दृष्टि और चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत किया है। आत्मव्यंग्य, रूपकों और भाषिक कलाकारी से भरपूर यह संग्रह न केवल गुदगुदाता है, बल्कि गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। यह संग्रह व्यंग्य विधा में एक साहसी शुरुआत है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 9, 2025
Blogs
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बेवकूफ बनना कोई साधारण काम नहीं, यह भी एक कला और तपस्या है, जिसमें सामने वाले को यह आभास भी न हो कि आप अभिनय कर रहे हैं। यह समझदारी का मुखौटा पहनकर मूर्ख दिखने की युक्ति है। हर कोई जन्मजात बेवकूफ नहीं होता, बल्कि कई बार जो दूसरों को बेवकूफ बना रहा होता है, वही सबसे बड़ा बेवकूफ सिद्ध हो जाता है। आजकल के घोटाले, फ्रॉड और योजनाएँ इसी बेवकूफी की ज़मीन पर फलते-फूलते हैं। लोकतंत्र में तो वोट तभी मिलते हैं जब मतदाता को बेवकूफ बनाए रखा जाए। बाज़ार में 'वन गेट वन फ्री' जैसे ऑफर इसी मानसिकता का हिस्सा हैं। सनातन काल में भी देवताओं को मोहिनी अवतार लेना पड़ा था — यानी तब भी यह कला प्रचलित थी। अतः प्रस्ताव है कि “राष्ट्रीय मूर्ख आयोग” की स्थापना की जाए, क्योंकि अब नीतियाँ यही कहती हैं: "समझदारी सवाल उठाती है, समाधान तो बेवकूफी ही देती है।" जय बेवकूफी! जय भारत!