आउल जी को भेंट-हास्य व्यंग्य कविता
सूरत की राजनीति में खानदानी गुरुर ने ऐसा पेंच फँसाया कि ‘बाई’ की जगह ‘राड’ निकल गया। जनसभाओं में गुणगान करते-करते सीट हाथ से निकल गई। लोकसभा में आंख मिचमिचाना भारी पड़ गया और खानदानी कुर्सी भी खिसक गई। मोहब्बत की दुकानें खोलने चले थे, मगर कुछ घर टूट गए—अब जनता भी कह रही है, “हाय देवा, हमें बचा!”