‘अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र’-भूमिका
यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।