‘अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र’-भूमिका

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 8, 2026 Book Review 0

यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।

काव्य संग्रह समीक्षा-तुम मेरे अज़ीज़ हो-डॉ मुकेश असीमित द्वारा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 8, 2025 Book Review 4

"तुम मेरे अज़ीज़ हो" सिर्फ प्रेम का नहीं, आत्म-संवाद, स्मृति और मौन की यात्रा है। पंकज त्रिवेदी की सरल भाषा में छिपे गहन भाव, प्रेम को एक दार्शनिक और अनुभूतिपरक अनुभव में बदल देते हैं। यह संग्रह पढ़ने नहीं, भीतर महसूस करने के लिए है।