लाइन में खड़े रहने का हुनर: भारतीय जीवन की सबसे बड़ी स्किल पर व्यंग्य
भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।
रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
“मैं उस दौर का अनाम प्रेमाचार्य था, जिसने प्रेम के सर्वहारा वर्ग के लिए जनहित याचिका की तरह प्रेमपत्र लिखे—निःशुल्क, निस्वार्थ और निस्संग।” “बिना शायरी के प्रेमपत्र ऐसा ही होता जैसे दाल बिना तड़के।” “एक ही प्रेमिका के लिए लिखते-लिखते हम भी ऊब गए—पर प्रेमियों के दिलों में आग बराबर जलती रही।”
बब्बन चाचा ने परदादा की संदूक में रखी मूँछें निकालकर इतिहास को चेहरे पर चिपका लिया। अब वे हर सुबह ‘इतिहास अलाप’ करते हैं और वर्तमान को ताले में बंद कर देते हैं—क्योंकि आजकल असली मेहनत से ज्यादा आसान है विरासत पहन लेना।
देवर्षि नारद इंद्र को बताते हैं कि मृत्युलोक में मूर्खता अब योग्यता, नीति और प्रमोशन का आधार बन चुकी है। बुद्धिमान अल्पसंख्यक हो चुके हैं और प्रश्न करना अपराध माना जाने लगा है। इस व्यंग्यात्मक संवाद में मूर्खता के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप का तीखा और हास्यपूर्ण चित्रण किया गया है।
आज के दौर में आदमी का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, फाइल में लगी डिग्री से तय होता है। डिग्री ज्ञान का प्रमाण कम, सामाजिक प्रतिष्ठा का पासपोर्ट अधिक बन चुकी है—और बेरोज़गारी इस पासपोर्ट पर रोज़ वीज़ा रिजेक्ट कर रही है।
जब झूठ ने मार्केटिंग का चोला पहन लिया, तो सच आउटडेटेड घोषित कर दिया गया। “झूठ महा-सेल” में हर वर्ग के ग्राहक उमड़े—नेता, एंकर, धर्मगुरु, कोचिंग संचालक—सब अपने-अपने झूठ के पैकेट खरीदते दिखे। इसी भीड़ में एक बूढ़ा आदमी सच खोजता रह गया…
नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।
वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।