हुकूमत बदली और हवेलियाँ काँपी: बुलडोज़र राजनीति पर तीखा व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Apr 18, 2026 हिंदी कविता 1

एक तीखा व्यंग्य जो सत्ता परिवर्तन, बुलडोज़र राजनीति और रसूखदारों के बदलते चेहरे पर करारा कटाक्ष करता है। पढ़ें यह समकालीन सामाजिक-राजनीतिक कविता।

असभ्यता का उद्घोष और सभ्यता की चुप्पी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 9, 2026 हिंदी कविता 0

यह कविता असभ्यता के शोर और सभ्यता की मौन शक्ति के बीच के द्वंद्व को उजागर करती है, जहाँ अंततः समय स्वयं निर्णय देता है कि स्थायी क्या है—अट्टहास या संवेदना।

तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की।

Vivek Ranjan Shreevastav Mar 23, 2026 हिंदी कविता 1

कुरुक्षेत्र से लेकर विश्व युद्धों तक मानव इतिहास संघर्षों से भरा रहा है, जहाँ विजय और पराजय के बीच अंततः पीड़ा ही शेष रही। यह कविता आधुनिक युद्धोन्माद के बीच प्रेम को एक ऐसी “पैट्रियाड मिसाइल” के रूप में खोजती है, जो नफरत की “स्कड मिसाइलों” को जन्म लेने से पहले ही निष्क्रिय कर सके।

नव संवत्सर गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 19, 2026 हिंदी कविता 0

“छंटे कुहासा, सूरज निकले, मन का हर अंधकार पिघले… नव विचारों के साथ यह संवत्सर केवल तिथि नहीं, बल्कि चेतना का एक नया उदय है।”

बीबी कहां छिटक गई-कविता रचना

Ram Kumar Joshi Feb 11, 2026 हिंदी कविता 2

यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।

मेरा देश आगे बढ़ रहा है-kavita

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 हिंदी कविता 0

“रास्ते मिल गए हैं, पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।” “हम आगे इसलिए नहीं बढ़े कि सबको साथ ले जाएँ, बल्कि इसलिए कि पीछे छूटे लोग दिखाई न दें।” “वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए— लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”

हुक्का-गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 1, 2026 हिंदी कविता 0

हुक्का सिर्फ़ धुआँ नहीं छोड़ता, वह सदियों की जाति उगलता है। उसकी चिलम में तंबाकू नहीं, इतिहास सुलगता है। जिसका हुक्का, उसकी हवा— बाक़ी सब अपराधी साँसें। यह गीत लोक का नहीं, जन्म से थोपे गए पहचान का है।

मेरी हिन्दी -डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 11, 2026 हिंदी कविता 2

“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।” “तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।” “राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।” “अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”

हाथी का शोर और डोर की कविता

Ram Kumar Joshi Jan 5, 2026 हिंदी कविता 1

सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन, जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता मसखरी लेकर लौटे। यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है, जिनकी आवाज़ भारी है और अर्थ हल्का।