मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।

Raghu Rai Tribute: कैमरे से समय को रोक देने वाला कलाकार

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2026 India Story \बात अपने देश की 0

भारतीय समय, सत्ता और संवेदनाओं को अपने कैमरे में कैद करने वाले Raghu Rai अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी तस्वीरें सिर्फ दृश्य नहीं, बल्कि इतिहास और मनुष्य की गहरी कहानियाँ हैं, जो पीढ़ियों तक हमें देखने की नई दृष्टि देती रहेंगी।

देशभक्ति वर्क फ्रॉम होम: डिजिटल क्रांतिकारियों पर तीखा व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 25, 2026 व्यंग रचनाएं 0

देशभक्ति वर्क फ्रॉम होम अब देखिए, देश बदला है तो जाहिर है देशभक्ति भी बदली है। अब आप भी कहाँ पुराने देशभक्ति का राग छेड़ने लगे हैं… गया वो ज़माना जब देशभक्ति हल चलाते किसान के पसीने में टपकती थी, सैनिक की वर्दी में शान से सीना उठाए चलती थी, और देश के युवा खून […]

विश्वास करने की कला –आर्ट ऑफ़ बीलिविंग

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 24, 2026 व्यंग रचनाएं 0

विश्वास जीवन की सबसे पुरानी मुद्रा है। गणित के मास्टरजी के “मान लो” से लेकर प्रेमी के चाँद-तारे, बाबा के स्वर्ग, बाजार की स्कीम और राजनीति के घोषणा पत्र तक—हर जगह आदमी विश्वास करता कम है, करवाया ज्यादा जाता है।

स्वैच्छिक जनसंख्या नियंत्रण: 21वीं सदी का अनिवार्य वैश्विक विमर्श

Dr Shailesh Shukla Apr 23, 2026 Agriculture/environment 1

21वीं सदी में जहाँ तकनीकी प्रगति नई ऊँचाइयों को छू रही है, वहीं अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि विकास के मॉडल को अस्थिर कर रही है। यह लेख उत्तरदायी अभिभावकत्व और स्वैच्छिक जनसंख्या नियंत्रण के माध्यम से संतुलित और टिकाऊ भविष्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

किताबों के साथ वो आँख-मिचौली वाला बचपन

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 23, 2026 व्यंग रचनाएं 0

विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।

विश्व पृथ्वी दिवस : चेतना का अंतिम निमंत्रण

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 22, 2026 Culture 0

धरती संकेत दे रही है, पर मनुष्य उन्हें अनसुना कर रहा है। विश्व पृथ्वी दिवस क्या केवल उत्सव बनकर रह गया है या यह आत्मपरीक्षण का अवसर है—यह लेख इसी प्रश्न को गहराई से टटोलता है।

हे ग्रीष्म देवी ,हे प्रचंड तापसी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 22, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब ग्रीष्म ऋतु देवी का रूप धरकर पृथ्वी पर उतरती है, तो सड़कें सूनी हो जाती हैं, बिजली आंख-मिचौली खेलने लगती है, जलजीरा और आइसक्रीम जीवनदायिनी प्रतीत होते हैं, और मनुष्य वातानुकूलित गुफाओं में शरण लेने लगता है। यह व्यंग्य रचना भारतीय गर्मी की त्रासदी को हास्य, तंज और सांस्कृतिक बिंबों के साथ बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है।

खाली वायदों का कार्ड: मुफ्त इलाज की राजनीति और अस्पतालों की त्रासदी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 20, 2026 Health And Hospitals 0

“कार्ड हाथ में है, भरोसा दिल में है—लेकिन इलाज फाइलों में अटका हुआ है। ‘खाली वायदों का कार्ड’ एक ऐसा व्यंग्य है जो स्वास्थ्य योजनाओं के पीछे छिपी सच्चाई को बेनकाब करता है।”