“मंच पर माला किसे मिले – माला समिति की महागाथा”
सम्मान समारोह में सबसे कठिन सवाल है—माला किसे मिले? माला समिति की गणित, मंच की आरक्षित कुर्सियों और फोटो की होड़ के बीच अपनी ही विनम्रता पर पछताते लेखक का चुटीला आत्मव्यंग्य।
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सम्मान समारोह में सबसे कठिन सवाल है—माला किसे मिले? माला समिति की गणित, मंच की आरक्षित कुर्सियों और फोटो की होड़ के बीच अपनी ही विनम्रता पर पछताते लेखक का चुटीला आत्मव्यंग्य।
**‘हाशिये के शब्द’ : विचार और संवेदना की साहित्यिक दस्तक** विवेक रंजन श्रीवास्तव की निबंध कृति ‘हाशिये के शब्द’ समकालीन समाज, धर्म, लोकतंत्र, भारतीय ज्ञान परंपरा, पर्यावरण और मानवीय संबंधों के अंतर्विरोधों को संवेदनशील दृष्टि से देखती है। सहज भाषा, वैचारिक गहराई और साहित्यिक लालित्य से समृद्ध यह पुस्तक उन विषयों को विमर्श के केंद्र में लाती है, जिन्हें समाज अक्सर हाशिये पर छोड़ देता है। अंजनी सक्सेना की समीक्षात्मक दृष्टि में यह कृति हिंदी निबंध साहित्य में एक चिंतनपरक और नवाचारी दस्तक है।
तोतों के आशियाने उजाड़कर मेट्रो स्टेशन बनाने की तैयारी और अफ़सरों का तर्क—“तोते कहीं भी उड़कर बैठ जाएँगे!” इसी प्रसंग से शुरू होता है विकास, पर्यावरण और सरकारी संवेदनहीनता पर चुटीला व्यंग्य। मॉर्निंग वॉक की चर्चाओं में हाथ से तोते उड़ने, तोते की तरह रटने और नक्कारखाने में तूती न बोलने जैसे मुहावरे व्यवस्था की पोल खोलते हैं। आखिर किसके हाथ से उड़ेंगे तोते—परिंदों के या परियोजना बनाने वालों के?
साहित्य में लिखने से ज्यादा जरूरी हो गया है दूसरों की सफलता पर जलना! किसी की पुस्तक छपी तो जलो, पुरस्कार मिला तो धू-धू करके जलो। एक ऐसे जलकुकड़े की आत्मस्वीकृति, जो अपनी जलन की आग में खुद को भून रहा है, मगर पड़ोसी के घर का परदा तक नहीं झुलसा पा रहा। डॉ. मुकेश ‘असीमित’ का चुटीला आत्मव्यंग्य
दिवाली की सफाई में घर का पुराना सामान ही नहीं, आदमी के पुराने शौक भी कटघरे में खड़े हो जाते हैं। कैमरे कबाड़ घोषित हो चुके हैं और किताबें अगली दिवाली तक अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। पत्नी की सफाई और लेखक की साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं के बीच फँसा एक चुटीला आत्मव्यंग्य—**‘दिवाली की सफाई’।**
अयोध्या राममंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण का समाचार स्रोतों पर आधारित निष्पक्ष विश्लेषण। चोरी के खुलासे, जाँच, नेतृत्व परिवर्तन और समितियों के पुनर्गठन की समयरेखा के साथ दान की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के सुझाव।
एआई अब केवल मशीन या तकनीक नहीं रहा, बल्कि शिक्षा से रोजगार, साहित्य से सत्ता और इंसानी सोच तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। सवाल यही है—तकनीक हमें आगे ले जा रही है या धीरे-धीरे हमारी ही जगह ले रही है? इसी विसंगति पर केंद्रित है यह चुटीला व्यंग्य—“ए आई, से यह कैसी नौबत आई!”
बुखार उन्हें आया है, लेकिन तैयारी मेरी चल रही है—चेहरे पर कितनी चिंता रखूँ, थैले में कौन-से फल और बातचीत में कौन-से किस्से? बीमार का हाल पूछने की सामाजिक औपचारिकताओं पर एक आत्मव्यंग्य।
व्यंग्य लिखते-लिखते जब लेखक को लगे कि अब इस विधा को और नुकसान पहुँचाना संभव नहीं, तो अगला स्वाभाविक कदम क्या हो? शायद व्यंग्य-विमर्श! साहित्यिक संगोष्ठियों, भारी-भरकम शब्दावली, चाय-समोसे, परस्पर महिमामंडन और “व्यंग्य संकट में है” जैसे सदाबहार विषयों पर एक चुटीला आत्मव्यंग्य।
जवान दिल की भी गारंटी नहीं होतीमैं जब किसी तीस-पैंतीस वर्ष के युवक को यह कहते सुनता हूँ कि “डॉक्टर साहब, मेरी उम्र ही क्या है, मुझे हार्ट की बीमारी कैसे हो सकती है?”, तो मुझे सबसे पहले यही लगता है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं, यह भरोसा है कि बीमारी अभी दूर […]