शिक्षा विनम्र बनाती है — या हमने शिक्षा को ही छोटा कर दिया है?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 20, 2026 Self Help and Improvements 0

शिक्षा विनम्र बनाती है — या हमने शिक्षा को ही छोटा कर दिया है? कहा जाता है—जितना आप शिक्षित होते हैं, उतना ही विनम्र, संवेदनशील और समझदार बनते हैं। शिक्षा केवल डिग्री का नाम नहीं, वह दृष्टि का विस्तार है। वह भीतर का अहंकार गलाकर मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि […]

अनुवाद: शब्दों से परे संस्कृतियों का सेतु

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 18, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

अनुवाद शब्दों का यांत्रिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संप्रेषण है। यह वह पुल है, जिस पर चलते हुए हम एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं, बल्कि एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में प्रवेश करते हैं। अनुवादक शब्दों के पीछे छिपे समय, समाज और संवेदना को पढ़ता है—और उन्हें नए पाठक के हृदय में पुनर्जन्म देता है।

पराधीनता का प्रश्न

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 18, 2026 India Story 0

पराधीनता का प्रश्न—इतिहास का नहीं, मानसिकता का “भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से […]

अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र : रोचक और पठनीय व्यंग्य संग्रह

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 17, 2026 Blogs 0

व्यंग्य में नित नए व्यंग्यकार प्रसूत हो रहे हैं।कई चौकन्नी नज़रों से विसंगतियों को पकड़ रहे हैं तो कई उन्मीलित अवस्था में परिदृश्य को निहार रहे हैं।पिछले चंद वर्षों में सक्रिय हुए व्यंग्यकार मुकेश असीमित रोज कुछ न कुछ लिखकर फेसबुक पर बेहद सक्रिय हैं।उनके पास व्यंग्य दृष्टि भी है।”अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र” उनका […]

वैलेंटाइन घाट पर ढेंचू-ढेंचू प्रेमकथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!

वैलेंटाइन महात्म्य कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“भद्रा में ‘आई लव यू’ न बोलें, केवल ‘हम्म’ प्राप्त होगा।” “शुक्र उच्च का हो तो गुलाब महँगा होगा।” “वचन लाभ में, आलिंगन अमृत में।” “ग्रह नहीं, बजट वक्री था।”