सेल्फ-लव नहीं, सेल्फ-जागरूकता ही सच्चा प्रेम है

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 25, 2026 Self Help and Improvements 0

आत्म-प्रेम हर इच्छा पूरी करने का नाम नहीं, बल्कि अपने प्रति कठोर सत्यनिष्ठ होने का साहस है। जागरूकता ही वह शक्ति है जो हमें आत्म-भोग से ऊपर उठाकर वास्तविक विकास की ओर ले जाती है।

नकल में नवाचार

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 25, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“हम इसे चोरी मानते ही नहीं। हम सीना ठोककर कहते हैं—यह हमारा मौलिक अधिकार है। हमने तो छह दिखाया था, आपने नौ समझ लिया तो यह आपकी दृष्टि-दोष है।” “हम विचारों की खेती कम और प्रतिलिपियों की फसल अधिक उगाते हैं।”

पटिया संस्कृति का पटाक्षेप !

Prem Chand Dwitiya Feb 24, 2026 व्यंग रचनाएं 0

कभी पटिए पर बैठकर शहर की राजनीति, समाज और संस्कार तय होते थे; अब वही चर्चाएँ व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर सिमट गई हैं। पटिया संस्कृति का यह पटाक्षेप समय की विडंबना है।

जूता बचाओ, शादी बचाओ अभियान

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।

गीता सार: कर्तव्य, समत्व और समर्पण का जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।

पहचान शब्दों से नहीं, साधना से बनती है

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 Self Help and Improvements 0

मनुष्य की पहचान उसके दावों से नहीं, उसके दैनिक चयन और प्रतिबद्धता से बनती है। हम जो निरंतर सोचते और साधते हैं, वही हमारे चरित्र और नियति को आकार देता है।

प्रदर्शनप्रिय मन और आंतरिक स्वतंत्रता की खोज

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 23, 2026 Self Help and Improvements 0

प्रदर्शनप्रिय मन बाहरी स्वीकृति को ही जीवन का आधार बना लेता है। दिखावे की यह प्रवृत्ति भीतर की असुरक्षा को ढकने का प्रयास है। सच्ची स्वतंत्रता तब जन्म लेती है, जब हम तालियों से ऊपर उठकर अपने अंतरात्मा की स्वीकृति को महत्व देते हैं।

माँ का लाडला-लघु कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 22, 2026 लघु कथा 0

हवेली की दीवारों में चिपकी यादें और पॉश कॉलोनी के सपने के बीच फँसा एक “माँ का लाडला” — यह सिर्फ घर की बहस नहीं, दो पीढ़ियों की मानसिकता का टकराव है।

पहचान का आईना: आप जो सोचते और साधते हैं, वही आप हैं

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 22, 2026 Self Help and Improvements 1

मनुष्य की असली पहचान उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके मन में बसे विचारों, उसके चुने हुए लक्ष्यों और उसके समर्पण से बनती है। हम वही हैं, जिसे पाने के लिए हम समय और ऊर्जा अर्पित करते हैं।