डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 14, 2026
Culture
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बच्चों को Good Touch, Safe Touch और Bad Touch की सरल जानकारी देने वाला जागरूकता गीत। Parents, Teachers और Schools के लिए उपयोगी Child Safety Awareness Campaign।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 22, 2026
Culture
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धरती संकेत दे रही है, पर मनुष्य उन्हें अनसुना कर रहा है। विश्व पृथ्वी दिवस क्या केवल उत्सव बनकर रह गया है या यह आत्मपरीक्षण का अवसर है—यह लेख इसी प्रश्न को गहराई से टटोलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 27, 2026
Culture
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क्या राम केवल एक ऐतिहासिक पात्र हैं या हमारे भीतर की एक चेतना? यह लेख राम को देह से तत्व तक समझने की एक गहन यात्रा है, जो बताता है कि राम किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि मानवता की सर्वोच्च संवेदनशील अवस्था हैं।
Dr Shailesh Shukla
Mar 26, 2026
Culture
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आज का बच्चा कहानियों से नहीं, एल्गोरिद्म से सीख रहा है।
क्या हम सुविधा के नाम पर उसके भावनात्मक विकास से समझौता कर रहे हैं?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 21, 2026
Culture
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गणगौर केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन की भावनाओं, आशाओं और सौंदर्य का उत्सव है। गाँव की उन गलियों में, जहाँ गीतों के साथ रिश्ते भी गूंजते थे, यह पर्व सचमुच “जीया” जाता था—न कि केवल निभाया जाता था।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 6, 2026
Culture
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घर और मकान के अंतर पर आधारित यह विचारात्मक आलेख बताता है कि घर केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि रिश्तों, स्मृतियों और अपनत्व की गर्माहट से निर्मित एक जीवित अनुभव है। जब तक उसमें अपने और अपनापन न हो, तब तक सबसे आलीशान मकान भी केवल एक खाली ढांचा रह जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
Culture
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Religion does not ask you to look up — it asks you to look within.
The moment you turn inward, illusion begins to dissolve.
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 13, 2026
Culture
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शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 29, 2026
Art and Craft
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भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई।
यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।
Priyanka Ghumara
Jan 12, 2026
Culture
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“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।”
“लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।”
“लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।”
“परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”