“AI हर जगह है” — एक व्यंग्य
दिसंबर 2025 आते-आते देश में ठंड उतनी नहीं बढ़ी,
जितनी AI की गर्मी बढ़ गई।
जिसे देखो वही कह रहा है
“भइया, अब बिना AI के कुछ नहीं होगा।”
“भइया, चाय कैसी है?”
बोला
“सर, AI से बनाया है, टेस्ट ऑप्टिमाइज़्ड है।”
बच्चा होमवर्क नहीं करता,
माँ डाँटती है
“मोबाइल छोड़!”
बच्चा जवाब देता है
“माँ, मैं नकल नहीं कर रहा,
AI से सीख रहा हूँ।”
ऑफिस में बॉस पूछते हैं
“काम क्यों नहीं हुआ?”
कर्मचारी बोलता है
“सर, AI ने सजेस्ट किया था कि
वर्क–लाइफ बैलेंस ज़रूरी है।”
नेता जी का भाषण सुनो तो लगता है
विचार कम, प्रॉम्प्ट ज़्यादा है।
हर वाक्य में शब्द वही
डिजिटल, स्मार्ट, भविष्य, AI
बस बीच-बीच में जनता का नाम जोड़ देते हैं
ताकि भाषण मानव-निर्मित लगे।
सबसे ज़्यादा परेशानी प्रतियोगी छात्रों की है।
पहले डर था
“पेपर कठिन आ गया तो?”
अब डर है
“पेपर इंसान बनाएगा या AI?”
कोचिंग वाले कह रहे हैं
“हमारे यहाँ AI से पढ़ाई होती है।”
और रिज़ल्ट वही पुराना
“मेहनत करने वालों का चयन होगा।”
मतलब AI भी कह रहा है
“भाई, जिम्मेदारी मेरी नहीं।”
दिसंबर की ठंड में लोग अलाव के पास नहीं,
चार्जिंग पॉइंट के पास बैठे दिखते हैं।
क्योंकि ठंड से ज़्यादा डर
बैटरी खत्म होने का है।
हाल ये है कि
इंसान सोच कम रहा है,
और पूछ ज़्यादा रहा है
“AI, बताओ मुझे क्या सोचना चाहिए?”
और शायद यही आज की सबसे बड़ी सच्चाई है
तकनीक बहुत स्मार्ट हो गई है,
पर इंसान अब भी यही सोच रहा है
कि नौकरी जाएगी या नहीं”।
लेखक
Wasim Alam
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