आत्ममूल्यांकन रिश्ते का केंद्र हैं,तुम बदल गए हो पहले ऐसे नहीं थे

 आत्मसम्मान हमें अपनी सीमाएं बनाने और दूसरों को अपनी भावनाओं का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य का जीवन रिश्तों के ताने-बाने से ही आकार लेता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सहयोग और सामाजिक संबंध—ये सभी हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करते हैं। किंतु आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में संवेदनशीलता की जगह स्वार्थ ने ले ली है और भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है। जो व्यक्ति दिल से निभाने का प्रयास करता है, वही अक्सर सबसे अधिक आहत और ठगा हुआ दिखाई देता है।

जब कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है, सामने वाले की सहूलियतों का ध्यान रखता है, उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करता है और स्वयं को बार-बार पीछे कर लेता है, तो यह त्याग हर बार सम्मान नहीं पाता। कई बार सामने वाला इस व्यवहार को प्रेम या अपनापन नहीं, बल्कि मूर्खता मान लेता है। यहीं से रिश्तों में असंतुलन की प्रक्रिया शुरू होती है।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की भावनाओं पर टिककर अपने अहंकार को बड़ा करते हैं। वे धीरे-धीरे स्वयं को अत्यधिक महत्वपूर्ण समझने लगते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि वही रिश्ते का केंद्र हैं, वही निर्णय लेने वाले हैं और सामने वाला व्यक्ति उनके बिना अधूरा है। इसी मानसिकता के चलते वे अनावश्यक उपदेश देने लगते हैं, हर विषय पर अपनी राय को अंतिम सत्य घोषित करते हैं और लगातार बोलते रहने को ज्ञान का प्रमाण मान लेते हैं।

समस्या सलाह देने में नहीं है, समस्या तब पैदा होती है जब सलाह सम्मान के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन जाए। जब संवाद बराबरी का न रहकर वर्चस्व स्थापित करने का साधन बन जाए। ऐसे लोग प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनाओं की भाषा नहीं समझते। वे हर रिश्ते को लाभ और हानि के तराजू पर तौलते हैं। उनके लिए रिश्ता एक साधन मात्र होता है, लक्ष्य नहीं।

यहीं से रिश्ते का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। संवाद का स्थान आरोप ले लेते हैं। समझ और धैर्य की जगह कटुता और वैमनस्य आ जाता है। हर बातचीत में यह सुनने को मिलता है—“तुम बदल गए हो”, “पहले ऐसे नहीं थे”, “अब तुम घमंडी हो गए हो”। वास्तविकता यह होती है कि यह परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मबोध होता है, जिसे स्वार्थी व्यक्ति स्वीकार नहीं कर पाता।

इसी कारण रिश्तों की शुरुआत में ही संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। प्रेम, मित्रता या सहयोग—किसी भी संबंध में स्वयं को पूरी तरह खो देना विवेकपूर्ण नहीं है। दूसरे को प्रसन्न रखने के लिए अपनी सीमाओं को बार-बार तोड़ना अंततः आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाता है।

आत्ममूल्यांकन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। रिश्तों में संवाद बहुत महत्वपूर्ण है। जब हम अपने विचारों और भावनाओं को खुलकर व्यक्त करते हैं, तो गलतफहमियां दूर होती हैं और रिश्ते मजबूत होते हैं।दूसरों की भावनाओं को समझने और उनकी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करना बहुत जरूरी है।अपने आत्मसम्मान को बनाए रखना बहुत जरूरी है। जब हम अपने आत्मसम्मान को बनाए रखते हैं, तो हम दूसरों के स्वार्थ और अहंकार के प्रभाव से बच सकते हैं। रिश्तों में सीमाएं बनाना बहुत जरूरी है। जब हम अपनी सीमाएं बनाते हैं, तो हम दूसरों को यह समझा सकते हैं कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। रिश्तों में समय देना बहुत जरूरी है। जब हम दूसरों के साथ समय बिताते हैं, तो हम उनके साथ मजबूत बंधन बनाते हैं।

समाज को भी यह समझने की आवश्यकता है कि हर कहानी के दो पक्ष होते हैं। जो व्यक्ति सबसे अधिक बोलता है, वही हमेशा सत्य बोल रहा हो, यह आवश्यक नहीं। और जो मौन है, वह दोषी हो—यह भी अनिवार्य नहीं। आज का समय कहानी गढ़ने वालों और उसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वालों का हो गया है, जहाँ सत्य से अधिक उसकी प्रस्तुति महत्त्वपूर्ण हो गई है। 

अंततः यही कहा जा सकता है कि रिश्ते तभी सुंदर और स्थायी होते हैं, जहाँ प्रेम हो, वहाँ आदर भी हो, जहाँ अपनापन हो, वहाँ स्वतंत्रता भी हो। और जहाँ यह सब न हो, वहाँ दूरी कोई पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की विजय होती है।

✍️ श्रीमती प्रियंका पवनघुवारा भूमिपुत्र टीकमगढ़ 

Priyanka Ghumara

Priyanka Ghumara

Content Writer at Baat Apne Desh Ki

Priyanka Ghumara is a passionate writer who shares insights and knowledge about various topics on Baat Apne Desh Ki.

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

37 minutes ago

यह लेख रिश्तों की उस सूक्ष्म सच्चाई को बेहद सहज और संवेदनशील भाषा में सामने रखता है, जिसे अक्सर लोग समझना नहीं चाहते। आत्मसम्मान और प्रेम के बीच संतुलन की बात करते हुए लेख यह स्पष्ट करता है कि मौन हमेशा कमजोरी नहीं होता और दूरी कई बार आत्मरक्षा का सशक्त माध्यम बन जाती है। आज के स्वार्थप्रधान समय में यह रचना पाठक को ठहरकर अपने रिश्तों, व्यवहार और सीमाओं पर आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करती है।