पहली अक्टूबर का दिन पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन समाज की उस अनमोल धरोहर को समर्पित है, जिनके अनुभव और मार्गदर्शन के बिना हमारा वर्तमान और भविष्य अधूरा है अर्थात हमारे वरिष्ठ नागरिक। संयुक्त राष्ट्र द्वारा सन् 1991 में इस दिवस की शुरुआत का प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार, उपेक्षा और उनकी चुनौतियों के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाना था। प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाने वाला यह दिवस हमें याद दिलाता है कि वृद्धावस्था में गरिमामय जीवन हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
इस वर्ष के थीम का भाव है.. निर्णय में बुजुर्गों का समावेश
आज हमारे वरिष्ठजन अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जैसे कि जोड़ों का दर्द, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और इनके उपचार का भारी खर्च, चिंता का विषय है। सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा की भावना और बढ़ती महंगाई उनके जीवन को और कठिन बना देती है। इन सबसे बढ़कर, आधुनिक जीवनशैली में बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में पलायन और जीवनसाथी के निधन के बाद का अकेलापन सबसे गहरी पीड़ा का कारण बन गया है। इसके अलावा, डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रही तकनीकी खाई भी उनके लिए दैनिक कार्यों को चुनौतीपूर्ण बना देती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।
परिवार के सदस्यों का बुजुर्गों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनना और उनके अनुभवों का सम्मान करना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।
वरिष्ठ नागरिक क्लब, सामुदायिक केंद्र, योग शिविर, और हॉबी कक्षाएं ऐसे मंच हैं जहां वे अपने साथियों के साथ जुड़ सकते हैं। यह सामाजिक अलगाव को तोड़ने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकता है।
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, अटल पेंशन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उनका लाभ उठाना बुजुर्गों की आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को कम करेगा।
एक रोचक पहलू बाजार की मानसिकता में आया बदलाव है। आजकल, चाय, दूध, बिस्कुट, दवाओं जैसे उत्पादों के विज्ञापनों में बुजुर्गों की छवि का बढ़ता उपयोग देखा जा सकता है। यह परिवर्तन इस ओर इशारा करता है कि विपणन जगत अब बुजुर्गों को विश्वसनीयता, पारंपरिक मूल्यों और ईमानदारी का प्रतीक मानने लगा है। उदाहरण के लिए, ‘फैमिलिंक’ जैसे उत्पाद, जो एक डिजिटल फोटो फ्रेम है, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है ताकि वे आसानी से अपने परिवार की तस्वीरें देख सकें। यह दर्शाता है कि अब उत्पाद डिजाइनिंग में भी बुजुर्गों की विशिष्ट आवश्यकताओं पर विचार किया जाने लगा है।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला दिन है। यह दिन हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि क्या हम अपने समाज के बुजुर्ग सदस्यों को वह सम्मान, सुरक्षा और स्नेह दे पा रहे हैं जिसके वह हकदार हैं। एक जिम्मेदार नागरिक और समाज के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि हम उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को समृद्ध, सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। आखिरकार, उन्होंने ही वह नींव रखी है, जिस पर हमारा वर्तमान और भविष्य टिका है।

लेखक
विवेक रंजन श्रीवास्तव
भोपाल
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