डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 17, 2026
Blogs
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व्यंग्य में नित नए व्यंग्यकार प्रसूत हो रहे हैं।कई चौकन्नी नज़रों से विसंगतियों को पकड़ रहे हैं तो कई उन्मीलित अवस्था में परिदृश्य को निहार रहे हैं।पिछले चंद वर्षों में सक्रिय हुए व्यंग्यकार मुकेश असीमित रोज कुछ न कुछ लिखकर फेसबुक पर बेहद सक्रिय हैं।उनके पास व्यंग्य दृष्टि भी है।”अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र” उनका […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 17, 2026
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“आपने प्रशासन को जगाया है न? अब भुगतो।
विकास की सुरसा अब खुले मुँह आपके नथुनों तक पहुँच चुकी है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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“भद्रा में ‘आई लव यू’ न बोलें, केवल ‘हम्म’ प्राप्त होगा।”
“शुक्र उच्च का हो तो गुलाब महँगा होगा।”
“वचन लाभ में, आलिंगन अमृत में।”
“ग्रह नहीं, बजट वक्री था।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 14, 2026
व्यंग रचनाएं
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“मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि बन गया।”
“जहाँ पीला, वहाँ हमारा।”
बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत, पास से लोकतांत्रिक चेपा-आक्रमण।
कालिदास ने कोयल लिखी, चेपों पर अभी शोध शेष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 14, 2026
India Story
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“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?”
“विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक!
क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है?
अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 13, 2026
Culture
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शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 13, 2026
Interview
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गंगापुर सिटी के वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन, लेखक और समाजसेवी डॉ. मुकेश चंद गर्ग ने बॉक्स एफएम पर अपनी 25 वर्षों की चिकित्सा यात्रा, साहित्यिक लेखन, आधुनिक ऑर्थोपेडिक तकनीकों और समाज सेवा के अनुभव साझा किए। यह प्रेरणादायक संवाद चिकित्सा और मानवीय मूल्यों के सुंदर संतुलन को उजागर करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 11, 2026
Health And Hospitals
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“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है।
यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है,
पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।”
आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं,
बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है।
मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो,
पर्यावरण के लिए सम्मेलन,
राजनीति के लिए भावनात्मक नारे—
ये सब प्लेसीबो हैं।
जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है,
तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 10, 2026
समसामयिकी
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सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।