डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 27, 2026
Self Help and Improvements
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हम अपने निर्णयों को स्वतंत्र मानते हैं, पर क्या वे सच में हमारे हैं? जब तक हम अपनी आदतों, भय और उधार की इच्छाओं को पहचान नहीं लेते, तब तक हम प्रतिक्रिया-प्रधान जीवन जीते हैं। जागरूकता ही वास्तविक स्वतंत्रता का प्रारंभ है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 27, 2026
Fashion,Food and Traveling
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दुनिया में हर वर्ष अरबों जानवर भोजन के लिए मारे जाते हैं। केवल 10 मिनट में लाखों जीवन समाप्त हो जाते हैं। जब हमारे पास विकल्प हैं, तब हमारी जिम्मेदारी भी शुरू होती है। प्रश्न यह नहीं कि शेर क्या खाता है—प्रश्न यह है कि हम, एक सभ्य मानव के रूप में, क्या चुनते हैं?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 26, 2026
Self Help and Improvements
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सत्य सिद्धांतों में नहीं, हमारे दैनिक व्यवहार और निर्णयों में प्रकट होता है। जब हम अपने जीवन को साक्षी भाव से देखना शुरू करते हैं, तब अनुभव ही हमारा शिक्षक बन जाता है और सत्य स्वयं स्पष्ट होने लगता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 26, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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अयोध्या हमारी पहचान है, लंका हमारी उपलब्धि।
धर्म इन दोनों के पार है—जहाँ साहस और विवेक मिलते हैं।
रामत्व अधिकार से बड़ा है, और सत्ता से मुक्त होने का नाम है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 25, 2026
Self Help and Improvements
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आत्म-प्रेम हर इच्छा पूरी करने का नाम नहीं, बल्कि अपने प्रति कठोर सत्यनिष्ठ होने का साहस है। जागरूकता ही वह शक्ति है जो हमें आत्म-भोग से ऊपर उठाकर वास्तविक विकास की ओर ले जाती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 25, 2026
व्यंग रचनाएं
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“हम इसे चोरी मानते ही नहीं। हम सीना ठोककर कहते हैं—यह हमारा मौलिक अधिकार है। हमने तो छह दिखाया था, आपने नौ समझ लिया तो यह आपकी दृष्टि-दोष है।”
“हम विचारों की खेती कम और प्रतिलिपियों की फसल अधिक उगाते हैं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 24, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 24, 2026
Self Help and Improvements
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मनुष्य की पहचान उसके दावों से नहीं, उसके दैनिक चयन और प्रतिबद्धता से बनती है। हम जो निरंतर सोचते और साधते हैं, वही हमारे चरित्र और नियति को आकार देता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 23, 2026
Self Help and Improvements
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प्रदर्शनप्रिय मन बाहरी स्वीकृति को ही जीवन का आधार बना लेता है। दिखावे की यह प्रवृत्ति भीतर की असुरक्षा को ढकने का प्रयास है। सच्ची स्वतंत्रता तब जन्म लेती है, जब हम तालियों से ऊपर उठकर अपने अंतरात्मा की स्वीकृति को महत्व देते हैं।