आप “सिम्पली ऑसम” हैं

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 India Story 1

हम यूँ ही नहीं हैं—हम अरबों कोशिकाओं, लाखों वर्षों और अनगिनत संभावनाओं का जीवित प्रमाण हैं। डीएनए सिर्फ़ जैविक संरचना नहीं, यह हमारी स्मृति, हमारे पूर्वजों और हमारे भविष्य का साझा दस्तावेज़ है। जब अस्तित्व अपने आप में चमत्कार है, तो निरर्थक होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

राजनीति की गीता: कुर्सीपुराण का अंश

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 5, 2026 व्यंग रचनाएं 0

यह गीता मोक्ष नहीं दिलाती, यह कुर्सी दिलाती है—और वही इसका सबसे बड़ा धर्म है।जहाँ कर्म दूसरों से कराया जाता है और फल स्वयं भोगा जाता है, वहीं से राजनीति का शास्त्र शुरू होता है।

व्यंग्य की बाराखड़ी : समय, संवेदना और सच की वर्णमाला

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 5, 2026 Book Review 0

‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं। इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं। यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।

रिश्तों की गाड़ी और दो करोड़ की एक्सेसरीज़

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?

चार्जर खोजता भविष्य और ज्ञान बाँटता अतीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 1

डायल-अप की खटखट से लेकर 5G की बेचैनी तक—यह व्यंग्यात्मक लेख पीढ़ियों की उस यात्रा को पकड़ता है जहाँ रिश्ते तारों से जुड़े थे, सपने EMI पर चले और अब अस्तित्व चार्जिंग पॉइंट ढूँढ रहा है। Gen X की स्मृतियाँ, Gen Y की व्यावहारिकता, Gen Z की रील-हक़ीक़त और Gen Alpha की स्क्रीन-सभ्यता—सब एक कमरे में, एक ही नेटवर्क पर।

हुक्का-गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 1, 2026 हिंदी कविता 0

हुक्का सिर्फ़ धुआँ नहीं छोड़ता, वह सदियों की जाति उगलता है। उसकी चिलम में तंबाकू नहीं, इतिहास सुलगता है। जिसका हुक्का, उसकी हवा— बाक़ी सब अपराधी साँसें। यह गीत लोक का नहीं, जन्म से थोपे गए पहचान का है।

वेदों का ब्रह्मांडीय समय और समय की सापेक्षता

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 29, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

समय को हम एक सीधी रेखा समझते आए हैं—घड़ी की सुइयों, दिनों और वर्षों में बँटा हुआ। लेकिन श्रीमद्भागवत पुराण की राजा ककुद्मी की कथा इस धारणा को पूरी तरह उलट देती है। यहाँ समय एक नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है—हर लोक, हर आयाम और हर चेतना-स्तर का अपना समय है। कुछ क्षणों की प्रतीक्षा पृथ्वी पर करोड़ों वर्षों में बदल सकती है। यह लेख राजा ककुद्मी की कथा के माध्यम से वैदिक काल-गणना, चतुर्युग की अवधारणा और आधुनिक विज्ञान में समय-विलंब (Time Dilation) के सिद्धांत के बीच अद्भुत साम्य को उजागर करता है। यह केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी ब्रह्मांडीय लघुता का बोध कराने वाला गहन दार्शनिक अनुभव है।

दुनिया ने हिंदुओं को किस नज़र से देखा—और यह नज़र किसने गढ़ी?

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 29, 2026 Art and Craft 0

भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई। यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।

मेरा नाम करेगा रोशन

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”

टंकी का बयान : एक गिरावट की आत्मकथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।