डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story
0
27 दिसंबर को ग़ालिब सिर्फ़ याद नहीं आते—वे हमारे भीतर बोल उठते हैं। उनकी शायरी “फेल्ट थॉट” है: जज़्बात की नर्मी और तर्क की रोशनी का दुर्लभ मेल।
ग़ालिब को पढ़ना मतलब अपनी उलझन, तन्हाई और हैरत के लिए सही लफ़्ज़ पा लेना—और फिर उन लफ़्ज़ों के साथ थोड़ा हल्का हो जाना।
आज के डिजिटल दौर में भी ग़ालिब उतने ही ज़रूरी हैं—क्योंकि वे हमें नफ़रत से कम, समझ से ज़्यादा जोड़ते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 26, 2025
हिंदी कविता
1
“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।”
“‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।”
“ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।”
“हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
People
0
यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
Culture
0
यह व्यंग्यात्मक चिट्ठी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की उन इच्छाओं का दस्तावेज़ है, जो सरकारों, बैंकों और व्यवस्थाओं से निराश होकर सीधे सांता क्लॉज़ तक पहुँचती हैं। मोज़ों से लेकर स्विस अकाउंट, बिजली बिल से लेकर बॉस की मीटिंग तक—यह रचना हास्य, विडंबना और करुणा के बीच झूलती एक सच्ची सामाजिक तस्वीर पेश करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 23, 2025
India Story
0
अरावली की अहमियत उसकी ऊँचाई में नहीं, उसके काम में है। सवाल यह नहीं कि पहाड़ी कितनी ऊँची है, सवाल यह है कि वह हमें क्या बचा रही है।अरावली को लेकर बहस दरअसल विकास और संरक्षण के बीच उस संतुलन की तलाश है, जो अक्सर नीति में खो जाता है और प्रकृति में दिखाई देता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 22, 2025
Book Review
0
समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है।
यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है।
जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है।
डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है।
यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 22, 2025
Culture
0
ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं।
वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की।
जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है।
शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 19, 2025
व्यंग रचनाएं
0
शिक्षक अब अ, आ, इ के साथ-साथ भौं-भौं व्याकरण में भी दक्ष हो रहे हैं।”
“लोकतंत्र में अब सिर्फ़ इंसान नहीं, कुत्ते भी सर्वे-योग्य नागरिक हो चुके हैं।”
“देश का भविष्य अब कक्षा में नहीं, गली-मोहल्लों में कुत्तों की गिनती में खोजा जा रहा है।”
“सरकार की नज़र में संख्याबल सर्वोपरि है—चाहे वह इंसान का हो या कुत्ते का।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 17, 2025
व्यंग रचनाएं
0
भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
0
अब बच्चा भगवान की देन नहीं, माता-पिता की पसंद बनता जा रहा है।
आँखों का रंग, करियर, आईक्यू—सब कुछ पैकेज में मिलेगा।
पर सवाल यह है कि डिज़ाइन में मासूमियत का कॉलम क्यों छूट गया?