फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

हवाओं से जंग और अज़्म की जीत

Shakoor Anvar Jan 8, 2026 गजल 0

तेज़ हवाओं और उग्र लहरों के बीच खड़ा मनुष्य जब हार मानने को होता है, तभी उसका अज़्म उसे जीवन की ओर लौटा लाता है। यह कविता द्वेष से मुक्त होकर, वफ़ा के सागर में एक नए जीवन-निज़ाम की कल्पना करती है।

हमें दिल का ज़माना चाहिए-गजल

Shakoor Anvar Jun 26, 2025 Poems 0

दिल के दौर में दुनिया ने खज़ाने मांगे। भूख से लिपटी आत्मा को सिर्फ़ आसरा चाहिए था। शिकारी ने निशाना ढूंढ़ा, और प्यार को बस ठिकाना चाहिए था। इस ग़ज़ल में जज़्बात, भूख, बेवफ़ाई और बेघरी की स्याही एक ही पन्ने पर फैली है।