जाति, गरीबी और अवसर: क्या आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का समय आ गया है?
क्या भारत की आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे जरूरतमंद नागरिकों तक पहुँच रहा है? सामाजिक न्याय, आर्थिक अभाव, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यकता-आधारित अवसरों पर संतुलित विमर्श।
क्या भारत की आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे जरूरतमंद नागरिकों तक पहुँच रहा है? सामाजिक न्याय, आर्थिक अभाव, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यकता-आधारित अवसरों पर संतुलित विमर्श।
लेखक किसी रचना को विचारों की प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देता है, शब्दों और मात्राओं से पालता-पोसता है और फिर पत्र-पत्रिका को भेज देता है। लेकिन जब वही रचना संपादक के “खेद सहित” लौट आती है, तो लेखक के मन की दशा वैसी हो जाती है जैसे मोबाइल घंटों चार्ज पर लगा हो और बाद में पता चले कि स्विच ही बंद था। साहित्यिक दुनिया की इसी विडंबना पर एक आत्मीय और चुटीला व्यंग्य।
भारतीय रेलवे आधुनिक ट्रेनों और विश्वस्तरीय स्टेशनों का दावा कर रहा है, लेकिन ट्रेन से गिरने तथा रेलवे ट्रैक पर चपेट में आने की घटनाओं में प्रतिदिन औसतन लगभग 44 लोगों की मृत्यु हो रही है। क्या केवल “चलती ट्रेन में न चढ़ें” की चेतावनी देकर रेलवे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?
जंतर-मंतर केवल आंदोलनों का ठिकाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ऐसा जादुई मंच है जहाँ नारों की आवाज संसद तक पहुँचती है। यहाँ कुछ आंदोलन तंत्र को बदल देते हैं, तो कुछ स्वयं छूमंतर हो जाते हैं। कॉकरोच-पार्टी से लेकर तंतर, मंतर और टाइम-आउट तक—डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक राजनीतिक व्यंग्य।
यह रचना संत कबीर की किसी मूल वाणी का शब्दशः गायन नहीं, बल्कि कबीर के निर्गुण दर्शन से प्रेरित डॉ. मुकेश असीमित की मौलिक प्रस्तुति है।नाम बिना क्या पाया? — तन माटी रो पुतला एक भावपूर्ण Kabir Nirgun Bhajan है, जो मनुष्य को धन, शरीर और सांसारिक वैभव के अभिमान से ऊपर उठकर सच्चे नाम की ओर देखने का संदेश देता है। यह fast version कबीर-भाव से प्रेरित एक मौलिक निर्गुण रचना है। गीत याद दिलाता है कि राजमहल, सोना-चाँदी, गाजे-बाजे और शरीर का अभिमान—सब यहीं रह जाता है। अंततः मनुष्य के साथ केवल उसके कर्म, भक्ति और सच्चे नाम का सहारा जाता है।
रिश्वत कांड में बड़े साहब की मृत्यु के बाद मुआवजे, सरकारी बंगले और अनुकम्पा नियुक्ति के लिए हुए समझौते पर आधारित तीखा हिंदी व्यंग्य।
लाफिंग क्लब के बाद अब क्राइंग क्लब! आधुनिक जीवन, अकेलेपन, आंसुओं और रोने की कला पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक हास्य-व्यंग्य।
पेपर लीक के विरोध से शुरू हुई ज़ेन ज़ी की किरांति एक इस्तीफ़े के बाद होटल की पार्टी तक पहुँच गई। मगर क्या मंत्री का त्यागपत्र मिलते ही व्यवस्था सुधर गई, भ्रष्टाचार समाप्त हो गया और विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हो गया? नई पीढ़ी की आंदोलन-शैली, रील, वाइब, वाटर कैनन और रिज़ाइन-पार्टी पर चुटीला व्यंग्य।
“नमामि शम्भु शिवम्” शिव ताण्डव स्तोत्र का सरल, लयबद्ध और संगीतबद्ध हिंदी गीत-भावानुवाद है। डमरू, पखावज, नगाड़ों और शक्तिशाली पुरुष-कोरस से सजी यह प्रस्तुति भगवान शिव के रौद्र, विराट और कल्याणकारी स्वरूप को सरल भाषा में श्रोताओं तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।
बड़े बाबू से लेकर सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञों तक—यह व्यंग्य उन ‘ज्ञानचंदों’ पर करारा कटाक्ष है, जो बिना माँगे हर मौके पर राय, नुस्खे और सलाह बाँटते हैं।