डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 23, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सृष्टि, आत्मा, परमात्मा, वेद, उपनिषद, दर्शन, भक्ति, योग और मानव जीवन को समझने वाली विशाल ज्ञान-परंपरा है। इस लेख में पंचमहाभूत, चार वेद, षड्दर्शन, नवधा भक्ति, सप्तर्षि, 33 देवता, नवग्रह, मन्वंतर और अन्य प्रमुख वैदिक-वेदोत्तर अवधारणाओं को सरल भाषा में समझिए।
badk_anushka
Aug 21, 2026
Food
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सरसों, सोयाबीन, पाम और सूरजमुखी तेल के दाम फिर बढ़ रहे हैं। आखिर खाने का तेल महंगा क्यों हुआ? जानिए वैश्विक युद्ध, आयात-निर्भरता, कमजोर रुपये, बायोफ्यूल और त्योहारी मांग का आपकी रसोई के बजट पर पड़ने वाला असर।
badk_anushka
Aug 21, 2026
News and Events
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रैपिडो बुक करते ही आदमी बाद में मिलता है, लेकिन उसका नाम, बाइक नंबर, रेटिंग और लोकेशन पहले पहुँच जाती है। डिजिटल मैप, लाइव लोकेशन और बाइक टैक्सी के इस दौर पर पढ़िए एक चुटीला हास्य-व्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 20, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज साहित्य में लेखक बढ़ रहे हैं, पाठक घट रहे हैं और पुरस्कारों की संख्या दोनों से तेज़ी से बढ़ रही है। उम्र, वजन, लेखन गति से लेकर डिजिटल रिचार्ज तक—यदि सम्मान बाँटने की यही रफ्तार रही तो हर लेखक के लिए कोई-न-कोई पुरस्कार तय मिलेगा। साहित्यिक पुरस्कार संस्कृति पर एक चुटीला और धारदार व्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 10, 2026
समसामयिकी
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राजस्थान की सड़कों पर आवारा सांड राहगीरों और वाहन चालकों के लिए जानलेवा खतरा बन चुके हैं। वर्ष 2019 के बाद आधिकारिक समेकित आँकड़े तक उपलब्ध नहीं—आखिर नंदी सड़क पर और व्यवस्था समाधि में कब तक रहेगी?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 8, 2026
Culture
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कवी भूषन – “कविता में रणभेरी “ कवि भूषण—वीररस के ओजस्वी शिल्पी, भाषा के बाजीगर और अलंकार-विधान के विलक्षण साधक—का नाम लेते ही आँखों के सामने युद्ध-डमरू की ध्वनि, नगाड़ों की गड़गड़ाहट, तोपों का गर्जन और अश्वारोही सेनाओं का प्रवाह जाग उठता है। यही तो वह काव्य-संसार है जहाँ “साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग […]
Dr Shailesh Shukla
Aug 6, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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क्या भारत की आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे जरूरतमंद नागरिकों तक पहुँच रहा है? सामाजिक न्याय, आर्थिक अभाव, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यकता-आधारित अवसरों पर संतुलित विमर्श।
Pradeep Audichya
Aug 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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लेखक किसी रचना को विचारों की प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देता है, शब्दों और मात्राओं से पालता-पोसता है और फिर पत्र-पत्रिका को भेज देता है। लेकिन जब वही रचना संपादक के “खेद सहित” लौट आती है, तो लेखक के मन की दशा वैसी हो जाती है जैसे मोबाइल घंटों चार्ज पर लगा हो और बाद में पता चले कि स्विच ही बंद था। साहित्यिक दुनिया की इसी विडंबना पर एक आत्मीय और चुटीला व्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 4, 2026
समसामयिकी
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भारतीय रेलवे आधुनिक ट्रेनों और विश्वस्तरीय स्टेशनों का दावा कर रहा है, लेकिन ट्रेन से गिरने तथा रेलवे ट्रैक पर चपेट में आने की घटनाओं में प्रतिदिन औसतन लगभग 44 लोगों की मृत्यु हो रही है। क्या केवल “चलती ट्रेन में न चढ़ें” की चेतावनी देकर रेलवे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?
Prem Chand Dwitiya
Aug 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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जंतर-मंतर केवल आंदोलनों का ठिकाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ऐसा जादुई मंच है जहाँ नारों की आवाज संसद तक पहुँचती है। यहाँ कुछ आंदोलन तंत्र को बदल देते हैं, तो कुछ स्वयं छूमंतर हो जाते हैं। कॉकरोच-पार्टी से लेकर तंतर, मंतर और टाइम-आउट तक—डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक राजनीतिक व्यंग्य।