Dr Shailesh Shukla
Mar 9, 2026
Blogs
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अयोध्या 2047 — विकसित भारत का सांस्कृतिक प्रतीक22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। उस दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं हुआ था, बल्कि एक राष्ट्र ने अपनी सांस्कृतिक चेतना को पुनः जागृत किया। इस ऐतिहासिक क्षण के बाद मंदिर के द्वार जनता के लिए 23 जनवरी 2024 को खुले और […]
Dr Shailesh Shukla
Mar 8, 2026
समसामयिकी
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मध्य पूर्व में छिड़ा ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष केवल एक सैन्य टकराव नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, कूटनीति और मानवीय संकट को गहराई से प्रभावित करने वाला भू-राजनीतिक तूफान बन चुका है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 8, 2026
Important days
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महिला दिवस पर मंचों, भाषणों और सोशल मीडिया के शोर के बीच एक सवाल बार-बार उठता है—क्या सचमुच महिलाओं के जीवन में कुछ बदलता है? यह व्यंग्य रचना उसी विडंबना को उजागर करती है, जहाँ सम्मान के समारोह तो बहुत हैं, पर असली महिला आज भी श्रम, जिम्मेदारियों और असमानताओं के चक्र में उलझी हुई है।
Prem Chand Dwitiya
Mar 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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कस्बे के अज्ञान चबूतरे पर जमा हुई यह होली की टोली केवल रंग-गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ढलती उम्र के अकेलेपन, अनुभव और हास्य का संगम है। सेवानिवृत्त अधिकारी, प्रोफेसर, पंडित और पुराने मित्र — सब मिलकर होली के बहाने जीवन की त्रासदियों को ठिठोली में बदल देते हैं।
Dr Shailesh Shukla
Mar 7, 2026
लघु कथा
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डॉ. शैलेश शुक्ला की ये पाँच लघुकथाएँ — वारिस, नमक का हक़, कागज़ की ढाल, जाति की छतरी और मुफ़्त का नशा — हमारे समाज की गहरी विडंबनाओं को उजागर करती हैं। लालच, विश्वासघात, व्यवस्था की असमानता, जातिगत राजनीति और मुफ़्तखोरी की मानसिकता पर ये कथाएँ संक्षिप्त होते हुए भी तीखा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती हैं।
Dr Shailesh Shukla
Mar 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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सरकारी व्यवस्था की सुस्त गति में यदि कोई शक्ति अचानक फाइलों को पंख लगाकर उड़ाती दिखाई देती है, तो वह है भ्रष्टाचार। यह व्यंग्य लेख बताता है कि कैसे रिश्वत की अनौपचारिक व्यवस्था आम नागरिक, अधिकारी और ठेकेदार—सभी के लिए “सुविधाजनक तंत्र” बन चुकी है।
Dinesh Gangarde
Mar 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब नौकरी विदा लेती है तो जीवन में एक नई नायिका प्रवेश करती है—पेंशन। यह ऐसी प्रेमिका है जो हर महीने समय पर आती है, मूड नहीं बदलती और बुढ़ापे में आत्मसम्मान और सुकून का सहारा बन जाती है। हास्य-व्यंग्य के अंदाज़ में पेंशन की इसी “वफादार महबूबा” पर यह रोचक लेख।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 7, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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मनुष्य की चेतना वस्तुओं को केवल वस्तु की तरह नहीं देखती, वह उनसे इच्छा, आसक्ति और पहचान जोड़ देती है। यही वस्तु को विषय बना देता है और यहीं से बंधन की शुरुआत होती है। वस्तु और विषय के इस सूक्ष्म अंतर को समझना ही मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 3, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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The fear of death does not arise from death itself, but from the ego’s false identification with body, mind, and memory. When we mistake the changing for the self, insecurity and fear follow. Freedom begins the moment we recognize ourselves as the witness—not the role, not the form, but the aware presence behind them.
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”