टाइम ट्रैवल: ब्रह्मांड की पुरानी फाइल में नई नोटशीट
टाइम ट्रैवल का सपना हर आदमी ने कभी-न-कभी देखा है—काश अतीत में जाकर दो-चार गलतियाँ सुधार आते। लेकिन ब्रह्मांड कोई तहसील का बाबू नहीं कि पुरानी फाइल में नई नोटशीट लगाकर मामला निपटा दे।
टाइम ट्रैवल का सपना हर आदमी ने कभी-न-कभी देखा है—काश अतीत में जाकर दो-चार गलतियाँ सुधार आते। लेकिन ब्रह्मांड कोई तहसील का बाबू नहीं कि पुरानी फाइल में नई नोटशीट लगाकर मामला निपटा दे।
आम कोई आम फल नहीं जी। खासकर हम जैसे डायबिटीज़ के मारे लोगों के लिए आम वैसा है जैसे सामने महबूबा खड़ी हो—महकती, मुस्कराती, रस टपकाती—और हम ग्लूकोमीटर की अदालत में अपराधी की तरह खड़े हों।
जब सत्ता चली जाती है तो फूल भी कृत्रिम लगने लगते हैं। “पावरलेस बर्थडे के फूल” राजनीति, भीड़तंत्र, होर्डिंग संस्कृति और लोकतांत्रिक नौटंकी पर करारा हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
छोटे से गांव में फैले प्रेम प्रसंग, पंचायत की चिंता और एक चतुर कोतवाल की अनोखी परीक्षा—“भूत इश्क का” हास्य, विडंबना और देसी मनोविज्ञान से भरपूर व्यंग्य कथा है, जो इश्क़ के चढ़ते और उतरते बुखार का मज़ेदार चित्रण करती है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है। यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वायत्तता, मीडिया की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।
हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास में महिलाओं की भागीदारी अब भी बेहद सीमित है। यह लेख हिंदी मीडिया में महिला पत्रकारों की स्थिति, नेतृत्व में असमानता, लैंगिक पूर्वाग्रह और बदलाव की संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?
मेडिकल कॉन्फ़्रेंस ज्ञान-वृद्धि के लिए होती हैं, ऐसा ब्रोशर कहता है। लेकिन डॉक्टरों, फार्मा स्टॉलों, गिफ्ट बैगों, फूड कोर्ट और फैमिली ज़ोन के बीच ज्ञान बेचारा अक्सर आख़िरी पन्ने पर चिपका हुआ मिलता है। यह संस्मरण उसी अकादमिक मेले का हास्य-व्यंग्यात्मक चित्र है।
“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”
चुनावी घोषणा पत्र लोकतंत्र का सार्वजनिक वचन होते हैं, लेकिन आज वे अक्सर राजनीतिक प्रचार का साधन बनकर रह गए हैं। यह लेख चुनावी वादों की जवाबदेही, राजनीतिक नैतिकता और लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।