मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में
मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।
मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।
देशभक्ति वर्क फ्रॉम होम अब देखिए, देश बदला है तो जाहिर है देशभक्ति भी बदली है। अब आप भी कहाँ पुराने देशभक्ति का राग छेड़ने लगे हैं… गया वो ज़माना जब देशभक्ति हल चलाते किसान के पसीने में टपकती थी, सैनिक की वर्दी में शान से सीना उठाए चलती थी, और देश के युवा खून […]
विश्वास जीवन की सबसे पुरानी मुद्रा है। गणित के मास्टरजी के “मान लो” से लेकर प्रेमी के चाँद-तारे, बाबा के स्वर्ग, बाजार की स्कीम और राजनीति के घोषणा पत्र तक—हर जगह आदमी विश्वास करता कम है, करवाया ज्यादा जाता है।
21वीं सदी में जहाँ तकनीकी प्रगति नई ऊँचाइयों को छू रही है, वहीं अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि विकास के मॉडल को अस्थिर कर रही है। यह लेख उत्तरदायी अभिभावकत्व और स्वैच्छिक जनसंख्या नियंत्रण के माध्यम से संतुलित और टिकाऊ भविष्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।
जब ग्रीष्म ऋतु देवी का रूप धरकर पृथ्वी पर उतरती है, तो सड़कें सूनी हो जाती हैं, बिजली आंख-मिचौली खेलने लगती है, जलजीरा और आइसक्रीम जीवनदायिनी प्रतीत होते हैं, और मनुष्य वातानुकूलित गुफाओं में शरण लेने लगता है। यह व्यंग्य रचना भारतीय गर्मी की त्रासदी को हास्य, तंज और सांस्कृतिक बिंबों के साथ बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है।
“कार्ड हाथ में है, भरोसा दिल में है—लेकिन इलाज फाइलों में अटका हुआ है। ‘खाली वायदों का कार्ड’ एक ऐसा व्यंग्य है जो स्वास्थ्य योजनाओं के पीछे छिपी सच्चाई को बेनकाब करता है।”
कृत्रिम मेधा (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने समाज, अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। यह लेख एआई से उत्पन्न संकटों—डीपफेक, रोजगार पर प्रभाव, एल्गोरिथमिक बायस, स्वायत्त हथियारों और पर्यावरणीय जोखिमों—का गहन विश्लेषण करता है और यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं।
एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की नज़र से लिखा गया यह हास्य-व्यंग्य लेख रिटायरमेंट समारोह की औपचारिकता, दिखावटी सम्मान और भीतर के खालीपन को चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। ढोल, भाषण, गिफ्ट और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से यह लेख जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े व्यक्ति के मनोभावों को उजागर करता है।
भारत में डिजिटल क्रांति ने जहां अवसर दिए, वहीं एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी—डिजिटल लत। यह लेख बताता है कि कैसे स्क्रीन के बढ़ते समय ने बच्चों, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।