हालात काबू में हैं

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 8, 2026 लघु कथा 0

चीखें हवा में तैर रही थीं, पर सायरनों की आवाज़ ने उन्हें ढँक लिया—व्यवस्था का संगीत शुरू हो चुका था। लाशें लाइन में सजा दी गईं—मृत्यु के बाद भी अनुशासन लागू था। कैमरे तैयार थे, आँसू भी—बस ‘सीन’ सेट होना बाकी था। और अंत में वही वाक्य—“हालात काबू में हैं।”

डॉ. शैलेश शुक्ला की 5 लघुकथाएँ

Dr Shailesh Shukla Mar 7, 2026 लघु कथा 1

डॉ. शैलेश शुक्ला की ये पाँच लघुकथाएँ — वारिस, नमक का हक़, कागज़ की ढाल, जाति की छतरी और मुफ़्त का नशा — हमारे समाज की गहरी विडंबनाओं को उजागर करती हैं। लालच, विश्वासघात, व्यवस्था की असमानता, जातिगत राजनीति और मुफ़्तखोरी की मानसिकता पर ये कथाएँ संक्षिप्त होते हुए भी तीखा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती हैं।

माँ का लाडला-लघु कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 22, 2026 लघु कथा 0

हवेली की दीवारों में चिपकी यादें और पॉश कॉलोनी के सपने के बीच फँसा एक “माँ का लाडला” — यह सिर्फ घर की बहस नहीं, दो पीढ़ियों की मानसिकता का टकराव है।

 गरमा-गरम फुल्के की तलाश

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 30, 2025 Blogs 0

मध्यमवर्गीय घरों में शादी अब दहेज या कुंडली से नहीं, फुल्का-कला से तय होती है। बब्बन चाचा का सपना था — एक ऐसी बहू जो गरमा-गरम फुल्के बनाए। पर आज की बहुएँ फुल्के नहीं, फॉलोअर्स सेंक रही हैं। जब इंस्टाग्राम ने रसोई संभाल ली, तो चूल्हा खुद ही बेरोज़गार हो गया।

रिश्ते आईसीयू में-व्यंग्य लघु कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 28, 2025 लघु कथा 4

शहर के सात सितारा आईसीयू के बाहर रिश्तेदार चाय की चुस्कियों और तानों में लगे हैं। अमन का दिल पिता की वेंटिलेटर पर गिनती करती साँसों और नौकरी के अल्टीमेटम के बीच झूल रहा है। इसी बीच ‘संस्कार प्लानर प्राइवेट लिमिटेड’ वाला इवेंट मैनेजर प्रवेश करता है, शोकसभा का पैकेज थमाते हुए। रिश्तों की अंतिम सांसों को मशीनें खींच रही हैं और संवेदनाएँ कॉर्पोरेट पैकेज में बदल रही हैं।

“आज़ादी के दिन का अधूरा सपना”-लघु कथा

Wasim Alam Aug 16, 2025 लघु कथा 4

"15 अगस्त के उत्सव में झंडे लहरा रहे थे, गीत बज रहे थे, लेकिन गांधी मैदान के किनारे नंगे पाँव बच्चे लकड़ी समेट रहे थे। उनके चेहरों पर डर और भूख लिखी थी। असली आज़ादी तब होगी जब बच्चे छत के लिए लकड़ी नहीं, सपनों के लिए कलम तलाशेंगे।"