Binni And Family -“बिन्नी, उसके दादाजी और हमारे अपने घरों की कहानी”

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 7, 2026 Cinema Review 0

“कल रात ‘Binny and Family’ देखी… आज सुबह से मन में वही दृश्य घूम रहे हैं—जैसे दादाजी की खामोशी में पूरा परिवार बोल रहा हो।” “यह फिल्म याद दिलाती है कि ‘पर्सनल स्पेस’ जरूरी है, लेकिन ‘किसी का होना’ उससे भी बड़ा सच है।” “जब बॉलीवुड ‘एक्सट्रीम’ बेच रहा हो, तब ‘सामान्य’ परिवार दिखा देना भी एक साहसिक सिनेमा-क्रिया है।”

‘जाने जान’ : Mind ,Maths and Morality

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 18, 2026 Cinema Review 0

नेटफ्लिक्स की जाने जान सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं, बल्कि दिमाग, नैतिकता और जुनून के बीच खेला गया शतरंजी खेल है। यह फिल्म जवाब कम देती है, सवाल ज़्यादा—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है।

स्वामी: पर्दे के पार एक असहज बहस — स्त्री, विवाह और निर्णय की आज़ादी

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 7, 2026 Cinema Review 0

यह लेख फिल्म स्वामी को कथानक, अभिनय या संगीत से आगे ले जाकर एक सामाजिक विमर्श के रूप में देखता है—जहाँ स्त्री-स्वतंत्रता, विवाह और निर्णय-स्वातंत्र्य टकराते हैं। यह समीक्षा उस अनुभव की तरह है, जो फिल्म देखने के बाद मन में चलता रहता है।

छप्पर फाड़ के – जब पैसा नैतिकता की छत हिला देता है

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 4, 2026 Cinema Review 0

अचानक मिला पैसा क्या सच में वरदान होता है, या वह इंसान की नैतिक नींव को भी हिला देता है? छप्पर फाड़ के एक ऐसी फ़िल्म है, जो हँसाते-हँसाते आपको अपने भीतर झाँकने पर मजबूर कर देती है—बिना उपदेश दिए, सिर्फ़ सवाल छोड़कर।

हक और हक़ीक़त के बीच खड़ी एक औरत

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 4, 2026 Cinema Review 0

यह फ़िल्म सिर्फ़ एक केस की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज, क़ानून, धर्म और स्त्री-अधिकार के बीच खड़े असहज सवालों को सामने रखती है। हक वह सिनेमा है जो परदे पर नहीं, दर्शक के भीतर बहस शुरू करता है।

स्कारलेट और राधा : दो सभ्यताएँ, दो स्त्रियाँ, दो जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 30, 2025 Cinema Review 0

“स्कारलेट भूख से लड़ती है, राधा भूख को सहकर मूल्य बचाती है।” “एक स्त्री स्वयं को बचाने के लिए समाज से टकराती है, दूसरी समाज को बचाने के लिए स्वयं से।” “स्कारलेट की जिद निजी है, राधा की दृढ़ता सामूहिक।” “दोनों हारती नहीं हैं, पर जीत की उनकी परिभाषा अलग है।”

राजेश खन्ना : सुपरस्टार से अकेलेपन तक — एक सितारे की पूरी कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 29, 2025 Cinema Review 0

राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार नहीं थे, वे उस दौर का नाम थे जब सिनेमा पूजा बन गया था। तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो आदमी शोर का आदी हो जाता है और खामोशी उसे डराने लगती है। जिसने एक बार शिखर को घर समझ लिया, वह ज़िंदगी भर मैदान को कमतर मानता रहा। काका की मुस्कान जितनी चमकदार थी, उनके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा।

धुरंधर : शोर, शो, शॉक और थोडा सा सिनेमा

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 16, 2025 Cinema Review 0

धुरंधर उस दौर की फिल्म है जहाँ सिनेमा से ज़्यादा उसकी चर्चा तेज़ है। हाइप, राष्ट्रवाद, हिंसा और स्टारडम के बीच फँसी यह फिल्म दर्शक से सवाल भी करती है और उसे थकाती भी है। एक छोटे शहर के दर्शक की नज़र से पढ़िए—धुरंधर का ईमानदार, हल्का व्यंग्यात्मक और संतुलित रिव्यू।

सितारे ज़मीन पर: जब ‘नॉर्मल’ की परिभाषा टूटती है और इंसान दिखाई देता है

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 14, 2025 Cinema Review 0

OTT पर देर से देखी गई आमिर ख़ान की सितारे ज़मीन पर एक होलसम, हार्ट-वार्मिंग सिनेमा अनुभव है, जो डाउन सिंड्रोम और लर्निंग डिसएबिलिटी जैसे संवेदनशील विषयों को बिना भावनात्मक शोर के, सहज मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह फ़िल्म तारे ज़मीन पर की याद दिलाती ज़रूर है, लेकिन अपनी ईमानदार संवेदना के कारण अलग पहचान भी बनाती है।

The Family Man Season 1 — एक पति, पिता और गुप्त एजेंट की दिल दहला देने वाली दास्तान

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 12, 2025 Cinema Review 0

“दि फैमिली मैन का पहला सीज़न एक साधारण परिवार वाले आदमी और एक टॉप–लेवल गुप्त एजेंट की दोहरी ज़िंदगी का ऐसा चित्र खींचता है, जिससे थ्रिल और भावनाएँ बराबर टकराती हैं। नर्व गैस अटैक की साज़िश, पारिवारिक खिंचाव, सिस्टम की सच्चाइयाँ और श्रीकांत के भीतर का संघर्ष—सब मिलकर एक गहरी, रियलिस्टिक और तीखी कहानी बनाते हैं।”