Criminal Justice Season 2 — बंद दरवाजों के सच
Criminal Justice Season 2 बंद दरवाज़ों के भीतर दबी उन चीखों का सच खोलता है जिन्हें दुनिया अक्सर सम्मान के आवरण में छिपा देती है। यह एक ऐसे रिश्ते की कहानी है जहाँ प्रेम नहीं, नियंत्रण साँस लेता है।
Criminal Justice Season 2 बंद दरवाज़ों के भीतर दबी उन चीखों का सच खोलता है जिन्हें दुनिया अक्सर सम्मान के आवरण में छिपा देती है। यह एक ऐसे रिश्ते की कहानी है जहाँ प्रेम नहीं, नियंत्रण साँस लेता है।
“नोलन की ‘ओपेनहाइमर’ एटॉमिक बम का इतिहास नहीं, उस आदमी की नैतिक ग्लानि और दार्शनिक उथल-पुथल की कहानी है जिसने विज्ञान को देवत्व भी दिया और विनाश भी।”“यह फिल्म बाहरी विस्फोट नहीं दिखाती—यह उस Scientist के भीतर की आग दिखाती है, जिसे दुनिया ने ‘डिस्ट्रॉयर ऑफ वर्ल्ड्स’ कहा और जिसने खुद को जीवनभर कटघरे में खड़ा रखा।”
“छोटे शहर के दर्शक की नजर से देखा जाए तो ‘जॉली LLB 3’ सिर्फ एक कोर्टरूम फिल्म नहीं—बल्कि कानून, संवेदना और किसान के संघर्ष का वह संगम है जो OTT की स्क्रीन को भी असली सिनेमा की गर्मी दे देता है।”
सत्यजीत रे केवल निर्देशक नहीं थे—एक दर्शन, एक दृष्टि, एक शांत चमत्कार। उनकी फिल्मों ने सिनेमा को कहानी से मनुष्य बना दिया और दुनिया को नया देखने की कला सिखाई।
"गोविंद निहलानी की ‘पार्टी’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, उच्चवर्गीय बौद्धिकता का एक्स-रे है। चमकते बंगले में इकट्ठा लोग साहित्य से ज़्यादा एक-दूसरे की पॉलिश चमकाते हैं। अनुपस्थित कवि अमृत की परछाईं पूरे माहौल पर भारी है, और उसका एनकाउंटर इस भीड़ की संवेदनहीनता को नंगा कर देता है।
“सिनेमाघर कभी मनोरंजन का देवालय था, जहाँ चाय-कुल्फी की आवाजें, तंबाकू की पिचकारियाँ, आगे की सीटों की रुई निकालने की परंपरा और इंटरवल का महाभारत—सब मिलकर एक सामूहिक उत्सव बनाते थे। वह जमाना गया, जब फिल्में हमें हमारी रियलिटी से कुछ पल उड़ा ले जाती थीं।”
धर्मेंद्र सिर्फ़ परदे के हीरो नहीं थे—वे देहाती मासूमियत, पंजाबी दिलेरी और रोमांटिक चमक का चलता-फिरता रूपक थे। वीरू की टंकी, खेतों की पगडंडियाँ, शोले की गूंज और फ़िल्मी किस्से—सब आज उनकी स्मृति बनकर रह गए हैं। पर कलाकार कभी नहीं मरते, धर्मेंद्र भी नहीं। वे हर मुस्कान में लौट आएँगे।
“होमबाउंड एक ऐसी फ़िल्म है जो दो दोस्तों की लॉकडाउन यात्रा के बहाने भारतीय समाज की गहरी परतों—जाति, धर्म, बेरोज़गारी और व्यवस्था—को छूती है। बेहतरीन अभिनय के बावजूद फिल्म कई जगह ऑस्कर-फ्रेंडली एजेंडा और सजावटी दुखों में उलझती दिखती है। पढ़िए एक ईमानदार, रोचक और व्यंग्यात्मक समीक्षा।”
Netflix की फिल्म Inspector Zende में मनोज बाजपेयी एक ईमानदार लेकिन दिलचस्प पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में नज़र आते हैं। यह 1980 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित क्राइम-कॉमेडी है, जो न खून-खराबे से भारी है और न गालियों से बोझिल। हल्की-फुल्की हास्यपूर्ण ट्रीटमेंट, दमदार अभिनय और जिम सरब के खलनायक रूप ने इसे परिवार संग देखने योग्य बना दिया है। यह फिल्म ताज़गी का एहसास कराती है।
‘Zwigato’ एक गिग-इकॉनॉमी राइडर की रोज़मर्रा की जद्दोजहद का सधी हुई, मानवीय चित्रपट है—जहाँ ऐप का एल्गोरिदम नई फैक्ट्री है, रेटिंग नया ठप्पा, और बारिश में भी चलती है रोज़ी-रोटी की बाइक। कपिल-शाहाना की बिना शोर वाली अदाकारी बेरोज़गारी, शोषण और शहरी पलायन की सच्चाइयों को नरमी से काटती है।