Shakoor Anvar
Mar 21, 2026
गजल
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फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं—
यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है,
और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है—
कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?
Shakoor Anvar
Jan 8, 2026
गजल
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तेज़ हवाओं और उग्र लहरों के बीच खड़ा मनुष्य जब हार मानने को होता है,
तभी उसका अज़्म उसे जीवन की ओर लौटा लाता है।
यह कविता द्वेष से मुक्त होकर, वफ़ा के सागर में
एक नए जीवन-निज़ाम की कल्पना करती है।
Kishan Tiwari
Sep 5, 2025
गजल
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किशन तिवारी 'भोपाल' की यह ग़ज़ल जीवन की पीड़ा, संघर्ष और रिश्तों की विडंबना का गहन बयान है। इसमें मोहब्बत और विश्वास के टूटे बंधन, सच पर अडिग रहना, महफ़िल में अकेलापन और सत्ता की चुप्पी जैसे बिंब पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाते हैं।
Prahalad Shrimali
Jul 10, 2025
गजल
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प्रह्लाद श्रीमाली की यह रचना हास्य और कटाक्ष के माध्यम से सामाजिक व्यवहारों, ढकोसलों और राजनीतिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती है। 'क्या मिला?' के सवाल के साथ यह रचना हमें अपने ही कर्मों, परंपराओं और सोच पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है।
Shakoor Anvar
Jun 26, 2025
Poems
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दिल के दौर में दुनिया ने खज़ाने मांगे। भूख से लिपटी आत्मा को सिर्फ़ आसरा चाहिए था। शिकारी ने निशाना ढूंढ़ा, और प्यार को बस ठिकाना चाहिए था। इस ग़ज़ल में जज़्बात, भूख, बेवफ़ाई और बेघरी की स्याही एक ही पन्ने पर फैली है।