फ़ाइलों में दबे चेहरे और खोती मानवीयता : भूमिपुत्र पवनघुवारा 

एक छोटी-सी समस्या के समाधान के लिए व्यक्ति फ़ाइलों के जंगल में भटकता है। फोन उठाने से लेकर जवाब देने तक हर कदम पर एक दीवार खड़ी है — उस दीवार का नाम है नौकरशाही की असंवेदनशीलता।

नौकरशाही का मूल उद्देश्य नागरिकों की सुविधा, प्रशासन की पारदर्शिता और नीतियों की समानता था। लेकिन धीरे-धीरे फ़ाइलों पर फैसले अब संवेदना से नहीं, “किसे खुश करना है और किससे बचना है” फ़ाइलें महीनों दबाई जाती हैं, नियुक्तियाँ वर्षों तक लंबित रहती हैं, और जब जवाब माँगा जाए तो कहा जाता है — “प्रक्रिया में है।” यह “प्रक्रिया” अब बहाने का दूसरा नाम बन चुकी है। जनता के सवालों का जवाब काग़ज़ों में मिलता है, लेकिन न्याय का उत्तर शून्य में खो जाता है। जहाँ जनता की पीड़ा आँकड़ों में बदल दी जाती है और आँकड़ों की भाषा में संवेदना मर जाती है। यह स्थिति लोकतंत्र के उस आत्मा को चोट पहुँचाती है जो “जन” से शुरू होकर “जन” पर ही समाप्त होती है। संवेदनहीनता केवल प्रशासन की नहीं, समाज की भी बीमारी बन चुकी है। आज दुर्घटनाओं के वीडियो बनाए जाते हैं, पर किसी को उठाने की हिम्मत कम ही होती है। गरीब की पीड़ा पर ताली बजाना आसान है, पर मदद करना कठिन। जहाँ ऊपर बैठे लोग ‘नीतियों’ की बात करते हैं, वहीं नीचे खड़े लोग ‘रोटी’ की। बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है। यही वह त्रासदी है जो लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर रही है।फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में “संवेदना” को “अपवाद” मान लिया गया है। यह विचलित करने वाली सच्चाई है कि जो तंत्र जनता की सेवा के लिए बना, वही तंत्र अब नागरिक को संदेह की दृष्टि से देखता है। अधिकारी जनता को सुविधा देने से अधिक उसके इंटेंशन पर शक करने लगे हैं। यह शक लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। यह संवेदनहीन तंत्र आम नागरिक की ज़िंदगी को उस “प्रतीक्षा की यातना” में बदल देता है जो कभी समाप्त नहीं होती।

लोकतंत्र तब तक जीवित रहता है जब तक उसमें संवाद और सहानुभूति बनी रहती है। 

 कानून तभी तक उपयोगी हैं जब वे मानवीयता की रक्षा करें, और प्रशासन तभी तक वैध है जब वह नागरिक के दुख को अपनी जिम्मेदारी माने। आज हमारे देश में हर विभाग में योजनाएँ हैं, लेकिन क्रियान्वयन में संवेदना नहीं है। यही कारण है कि योजनाएँ “रिपोर्ट कार्ड” बनकर रह गई हैं, न कि राहत का साधन।

 जिम्मेदारी हैं। हर निर्णय के पीछे केवल नियम नहीं, जीवन छिपे होते हैं। फ़ाइलें तब तक अर्थहीन हैं जब तक उनमें इंसान की कहानी नहीं झलकती। पद का अहंकार अगर सेवा की भावना से नहीं मिला, तो हर नीति अधूरी रह जाएगी। आज आवश्यकता “अकुशल प्रशासनिक मशीनरी” की नहीं, “मानवीय प्रशासन” की है — जहाँ प्रत्येक निर्णय के केंद्र में नागरिक का दुःख, उसकी गरिमा और उसका जीवन हो। कानून की कठोरता के साथ मानवीयता की कोमलता भी जरूरी है। क्योंकि 

लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।फ़ाइलों के बीच मरती संवेदनाएँ: नौकरशाही, सत्ता और संवेदनहीनता आज अगर फिर से मनुष्यता को जीवित नहीं कर पाए, तो अगली पीढ़ियाँ हमें “संवेदनहीन युग” कहकर याद करेंगी।आज केवल एक सामाजिक विकृति नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और संगठित आपराधिक तंत्र का रूप ले चुकी है न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं को भी परिवार की सामाजिक पीड़ा को समझने की आवश्यकता है।स्वास्थ्य केवल आर्थिक विकास का फल नहीं, बल्कि मानव गरिमा की बुनियाद है।पर्यावरण को केवल आपदा या दिवस के रूप में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की चिंता के रूप में प्रस्तुत करना होगा।यदि हम सच में एक मजबूत, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक भारत चाहते हैं, तो हमें उन आवाज़ों को सुनना होगा जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। सवालों से डरने के बजाय उनका सामना करना होगा।योजनाओं को समयबद्ध, प्रभावी और सतत तरीके से लागू करे, तो विश्वास केवल टिकता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज की मजबूती का प्रतीक बन जाता है।

नीतियों को केवल कानूनों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर संवेदनशील बनाना होगा।

✍️ पवनघुवारा भूमिपुत्र टीकमगढ़ 

Pawan Ghumara

Content Writer at Baat Apne Desh Ki

Pawan Ghumara is a passionate writer who shares insights and knowledge about various topics on Baat Apne Desh Ki.

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