“जय जगन्नाथ”
पुरी मे धड़क रहा कृष्णा का हृदय बनकर जगन्नाथ धाम,
मन को जन जन के हर्षित करता
आँखों मे बसा अविराम।
जिसके शिखर की परछाई न बनती,
और पताका भी वायु के विरुद्ध लहराती
करते हम उसे शत शत प्रणाम।
जामुन लकड़ी से बनी वो मूरत,
नवकलेवर का करती श्रृंगार।
कम न पड़ता प्रसाद जहाँ,
कहते हैसब जगन्नाथ का भात
जगत पसारे हाथ।
देखो!धूमधाम से निकल पड़े रथ,
जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम के
आज।
कैसा अद्धभुत दृश्य है,
ढ़ोल नगाड़ो का चहुँ ओर शोर है।
भक्तो से मिलने स्वयं निकलते प्रभु,
धरा हुईं धन्य कि ईश्वर साक्षात् दर्श दिखाते है
मंगलमय बेला ये पुनीत पावन,
जहाँ छेरा पहरा की चलती अनोखी रस्म।
गुंडीचा मौसी के मंदिर जाते
रथो पर सब सवार,
आलोकित होती दृष्टि सृष्टि,
पहनकर जगन्नाथ के प्रेम का हार।
रथ यात्रा ये नहीं कोई साधारण,
आस्था, अध्यात्म, एकता का
सोना यहाँ बरसता है।
अधिक क्या कहूँ मै दीना नाथ,
दीप भाव का प्रज्वलित करती हूँ।
मन की हऱ दीवार पर,
बस जय जगन्नाथ ही लिखती हूँ।

रचनाकार -नेहा जैन जन्मस्थान-ललितपुर उत्तरप्रदेश
शिक्षा -बी. एस. सी बायो, एम एस सी.फ़ूड टेक्नोलॉजी, एम. ए.अंग्रेजी, बी. टी. सी., बी. एड., प्राविधिक कला डिप्लोमा
संप्रति -शिक्षिका और मंच संचालिका
नवाचारी शिक्षिका के रूप मे जिले मे सम्मानित।
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