मेरे घर की ये  दीवारें-कविता रचना

मेरे घर की ये  दीवारें ,
मुझे रोज देखती है ।
कभी देखती नाचते गाते ,
कभी रोते देखती है ।

छोटे छोटे सपने बुनते,
तिनके तिनके रोज जुड़ते ,
बड़े सपनो को टूटते देखती है ।

कभी देखती घुल मिल रहते ,
कभी देखती लड़ते झगड़ते ,
कभी बीच की दीवार सुधार देखती है

मन का वो मरोड़ देखती है,
दिल में हो रहा शोर देखती है,
विक्षुब्ध अनचाहे खर -पतवार देखती है ।

विद्या पोखरियाल

Vidya Dubey

विद्या पोखरियाल ✍️ बैकुंठपुर छत्तीसगढ़

विद्या पोखरियाल ✍️ बैकुंठपुर छत्तीसगढ़

Comments ( 3)

Join the conversation and share your thoughts

डॉ मुकेश 'असीमित'

5 months ago

bahut bahut abhaar

Vidya Dubey

5 months ago

धन्यवाद

Bhavesh Garg

5 months ago

vawoo