माँ बनने से कठिन है माँ बने रहना ! डॉ. श्रीगोपाल काबरा

माँ बनने से कठिन है माँ बने रहना !
डॉ. श्रीगोपाल काबरा

उसने नौ महीने गर्भ वहन किया। प्रसव हुआ। प्यारा सा खूबसूरत बच्चा। शहर आई और बच्चे को मुँह-अंधेरे चुपके से बालगृह के पालने में छोड़ दिया। नहीं, बच्चा अवैध नहीं था। पति साथ था, दूर कोने में खड़ा था। वह पलट कर देखने लगी तो फुसफुसाया था, ‘सीधे चल, सब किया कराया बेकार करेगी।’

उस माँ की क्या मानसिकता रही होगी? वह सहज माँ बनी थी। अनपढ़ ग़रीब थी। कह नहीं सकती थी पर माँ बन कर तृप्त थी। नौ महीने हर तरह के कष्ट सहने के बावजूद गर्भ वहन किया था। पति को भी बच्चे से कम लगाव नहीं था। बच्चे की ख़ातिर खुद भूखे रह कर भी माँ को सदा खाना दिया। फिर क्यों बच्चे को त्याग दिया?

माँ बनना अगर ममता के वशीभूत था तो क्या त्यागते समय ममता मर गई? उसने बच्चे को अहित करने के लिए नहीं त्यागा। अगर ऐसा होता तो वह शहर आकर पालने में क्यों छोड़ती? किसी भी निर्जन स्थान पर ऐसा कर सकती थी। उसने ममता नहीं त्यागी, वरन् ममता के वशीभूत होकर ही ऐसा किया। मन में हाहाकार मचा था, उम्र भर सालती रहेगी इस क्षण की पीड़ा।

अब एक और नज़ारा। गहनों से लकदक, कानों में बड़े-बड़े हीरे के टॉप्स, अँगूठी और गले में महँगा मंगलसूत्र पहने, लक्ज़री कार से आई महिला जब पंचसितारा नर्सिंगहोम की चिकित्सक को गर्भ नष्ट करने के वास्ते भारी फ़ीस देती है तब उसकी क्या मानसिकता होती है? उसकी माँ बनने की जैविक मजबूरी और माँ न बने रहने का सांसारिक सोच, संवेदना और ममता, तो बिलकुल अलग स्तर की होती हैं। उन शिक्षित और सम्पन्न विवाहित महिलाओं की जो माँ बनने के बाद महज़ इसलिए कि बच्चे का जन्म असुविधाजनक होगा, गर्भ नष्ट करवाती हैं, क्या मानसिकता होती है? लाखों महिलाएँ ऐसा करती हैं। इसको इतनी सहज सामाजिक मान्यता क्यों?

माँ बनने से कठिन है माँ बने रहना? क्या माँ बनने और माँ बने रहने के निर्णायक तत्त्व अलग-अलग हैं? क्या माँ बनना जैविक प्रक्रिया है और माँ बने रहना बौद्धिक? क्या एक प्राकृतिक और दूसरी सांसारिक? क्या माँ बनने के लिए सृजन की संवेदना आधुनिकीकरण की आपाधापी में क्षीण हो रही है? क्या आधुनिक शिक्षा से सृजन की संवेदना कम हो रही है? क्या माँ बनने की इच्छा मर रही है? सहजवृत्ति पर बौद्धिकता, प्रकृति पर सांसारिकता हावी हो रही है?

ममता का सहज प्राकृतिक रूप क्या है? उसका आधार क्या है?

हर जीवधारी/प्राणी के प्रकृति नियत दो मूल कर्म होते हैं। एक, स्वयम् का अस्तित्त्व बनाए रखने के लिए अपने शरीर की रक्षा करना और दूसरा,
अपनी प्रजाति का अस्तित्त्व बनाए रखने के लिए प्रजनन कर सन्तति उत्पन्न करना, जो ममता का आधार है; स्त्री और पुरुष दोनों में।

माँ बनना यौन गुणसूत्र संचालित, प्रकृति नियत, स्वतःस्फूर्त, आत्म सुख देने वाला सहज सृजन कर्म है। माँ बने रहना बौद्धिक मस्तिष्क का सांसारिक नियम। प्रसवोपरांत माँ का शिशु के प्रति लगाव, वात्सल्य, बच्चे के भरण पोषण के लिए होता है। शरीर से विलग हुए प्राणी के प्रति सांसारिक पक्ष हावी होने लगता है।

वह माँ बन कर तृप्त थी लेकिन उसको कैसे पालेगी सोच कर त्रस्त। बच्चे को पालने में छोड़ने से उसकी ममता नहीं क्षीण हुई थी, वरन् वात्सल्यवश ही उस ग़रीब युगल ने बच्चे को पालने में छोड़ा था। वे जानते थे और निश्चिन्त थे कि बच्चे की देख-रेख, भरण-पोषण वहाँ बेहतर होगा। ऐसा, जैसा वे स्वयम् नहीं कर पाएँगे, मज़दूरपेशा उन दोनों की स्थिति ऐसी नहीं थी।

सरल सीधा जीवन जीने वाली उस अनपढ़ महिला का वात्सल्य से हिलोरें मारता मन क्या इतनी आसानी से मर जाएगा? उसने पालने में छोड़ने से पहले बच्चे को भरपेट अपना दूध पिलाया था। स्तनों में उतर आया दूध क्या इतनी आसानी से सूख जाएगा? बड़ी पीड़ा होती है। भीगी अँगिया छुपाए, मज़दूरी करती, कितना रोएगी अपनी बेबसी पर।

पालने में छोड़ा गया हर शिशु अथाह पीड़ा की एक ऐसी ही मूक गाथा है। इसका अनुभव एक माँ ही कर सकती है, एक विवश माँ जिसे अपने दूध पीते नवजात शिशु को इस प्रकार छोड़ना पड़ा हो।

माँ बनने से माँ बने रहना सचमुच अधिक कठिन होता है।
डॉ. श्रीगोपाल काबरा
15, विजय नगर, डी-ब्लॉक, मालवीय नगर, जयपुर- 302017 मोबाइलः 8003516198

Dr Shree Gopal Kabra

Content Writer at Baat Apne Desh Ki

Dr Shree Gopal Kabra is a passionate writer who shares insights and knowledge about various topics on Baat Apne Desh Ki.

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