“विकास की वातानुकूलित आत्महत्या”
“पहले प्रकृति नष्ट करो, फिर प्रकृति की नकल खरीदो — यही आधुनिक विकास का सबसे बड़ा दर्शन बन चुका है।”
India Ki Baat
“पहले प्रकृति नष्ट करो, फिर प्रकृति की नकल खरीदो — यही आधुनिक विकास का सबसे बड़ा दर्शन बन चुका है।”
चुनावी घोषणा पत्र लोकतंत्र का सार्वजनिक वचन होते हैं, लेकिन आज वे अक्सर राजनीतिक प्रचार का साधन बनकर रह गए हैं। यह लेख चुनावी वादों की जवाबदेही, राजनीतिक नैतिकता और लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
वोट क्यों कटे? सिर्फ इसलिए कि आदमी मर गया? चुनाव हार रहे प्रत्याशी कह रहे हैं कि उनके सबसे भरोसेमंद वोटर यानी मृत आत्माएँ ही वोटर लिस्ट से हटा दी गईं। इस हास्य-व्यंग्य में वोटर लिस्ट, SIR नियम, पुनर्जन्म और लोकतंत्र की आत्मा के बहाने चुनावी राजनीति पर करारा कटाक्ष है।
आज का विश्व गहरे संकटों और विभाजनों से गुजर रहा है। ऐसे समय में भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक अनुभव, संतुलित विदेश नीति और युवा शक्ति के कारण विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है। यह लेख विश्व निर्माण में भारत की संभावित और आवश्यक भूमिका का विश्लेषण करता है।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है? जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, सतत विकास, जल संरक्षण, जंगल, ऊर्जा और भारत के भविष्य पर आधारित विस्तृत हिंदी लेख पढ़ें।
शोक सभा में जाना भी एक सामाजिक परीक्षा है। बाब्बन चाचा इस परीक्षा में इतने अनुभवी हैं कि संवेदना व्यक्त करते-करते रिश्ता, पुट्टी और प्रॉपर्टी तक की चर्चा छेड़ देते हैं।
जब साहित्य प्रयोगशाला बन जाए, पुरस्कार गुरुत्वाकर्षण से गिरने लगें और चापलूसी ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की जगह ले ले — तब न्यूटन, आर्किमिडीज़ और डार्विन भी व्यंग्य में प्रवेश कर जाते हैं। डॉ. मुकेश ‘असीमित’ का समकालीन साहित्य पर तीखा, चुटीला और वैज्ञानिक कटाक्ष।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आलोचना सहने की क्षमता होती है। न्यायपालिका संविधान की संरक्षक अवश्य है, किंतु क्या वह आलोचना से ऊपर हो सकती है? यह लेख न्यायपालिका की गरिमा, अवमानना कानून, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संतुलन की गंभीर पड़ताल करता है।
नई दिल्ली की ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया गया था— “धीरे-धीरे खाओ, ठंडा करके खाओ…” लेकिन जब सिस्टम गरम हुआ, तो सबसे पहले जल गया—एक ‘बाबू’।
जब पति भी नौकरी की तरह “फुल-टाइम वैकेंसी” बन जाए, तो समझिए वैवाहिक जीवन ने नया स्टार्टअप मॉडल पकड़ लिया है। यह व्यंग्य न केवल हँसाता है, बल्कि शादी की सच्चाइयों का आईना भी दिखाता है।