मैंने अपने क्लीनिक में प्रवेश किया। कई मरीज़ विश्राम कक्ष में बैठे हुए थे। कुछ के चेहरे पर संतोष था—शायद मेरे इलाज से उन्हें लाभ हुआ हो। कुछ आशंकित मुद्रा में बैठे थे—शायद पहली बार आए थे या फिर पूर्ववर्ती इलाज से संतुष्ट नहीं थे। एक वृद्ध सज्जन इधर-उधर टहल रहे थे। सफ़ेद दाढ़ी थोड़ी बढ़ी हुई थी और पहनावा पूर्णतः ग्रामीण।
मेरे प्रवेश करते ही उनका चेहरा खुशी से चमक उठा और अचानक उन्होंने सम्मानपूर्वक झुकते हुए मेरे पाँव छू लिए। मैं थोड़ा सकपकाया। मुझसे लगभग दोगुनी उम्र के बुज़ुर्ग मेरे पाँव छू रहे थे। कहने लगे—“डॉक्टर साहब! आप तो भगवान हो, आपने मुझे जीवा दिया।” जो मरीज़ संतुष्ट मुद्रा में बैठे थे, उनके चेहरे पर भी मुस्कान फैल गई, और जो शंका में थे, उनकी आँखें भी चौड़ी हो गईं।
प्रतिक्रिया स्वरूप मेरी छाती और तन गई। मैं झुका, उन बुज़ुर्ग को कंधे से उठाया और हाथ जोड़ते हुए कहा—“यह तो मेरा काम है।” अपनी अकड़ी हुई चाल, और गर्वित सिर को उठाए, मैं अपने परामर्श कक्ष में प्रवेश कर गया। भगवान होने की अनुभूति निश्चित ही श्रेष्ठतम अनुभूतियों में से एक है—या संभवतः यही एक अनुभूति है जो सर्वोच्च है।
मैंने स्मरण करने की कोशिश की—शायद मेरे किसी ऑपरेशन या औषधि से उन बुज़ुर्ग को अत्यधिक लाभ हुआ हो, पर कुछ भी विशेष याद नहीं आया। निश्चित ही मेरे पास वह शक्ति है जो मरणासन्न पीड़ा में तड़पते रोगी को राहत दे सकती है, मृत्यु की आशंका से त्रस्त बीमार को जीवन की आशा दे सकती है या मृत्यु की ओर बढ़ते मरीज़ को जीवनदान दे सकती है। भगवान होना तो बनता है।
प्रथम मरीज़ ने परामर्श कक्ष में प्रवेश किया। वह उन्हीं आशंकित मरीज़ों में से थे जिन्हें मेरे उपचार से शायद लाभ नहीं हुआ था। अंदर आते ही कुछ तल्ख़ स्वर में बोले—“कोई फायदा नहीं हुआ डॉक्टर साहब, साँस पहले से ज़्यादा फूल रही है, दवा से तो उल्टा तकलीफ़ और बढ़ गई है।”
भगवान पर यह आरोप मन को क्षुब्ध कर देने वाला था। क्या मेरी प्राणदायी शक्तियाँ झूठी हैं? क्या वे इतनी दुर्बल हैं कि इस मरीज़ पर प्रभाव नहीं दिखा सकीं? भगवान होने की अनुभूति से अहंकारित मेरा मन सत्य के धरातल पर आकर गिर पड़ा।
मैंने मरीज़ का परीक्षण किया, उसे समझाया कि मैं तो केवल चिकित्सकीय ज्ञान के आधार पर यह परामर्श दे सकता हूँ कि आपके लिए क्या उपयुक्त रहेगा। लाभ होगा या नहीं—यह तो ऊपरवाले के हाथ में है। अचानक जो भगवान “मैं” बन गया था, वह अब “ऊपरवाला” बन गया था, और मैं एक साधारण मानव—जिसे मात्र चिकित्सकीय प्रशिक्षण द्वारा कुशल किया गया था।
मैंने उन्हें समझाया, दवाएँ बदलीं और नम्रतापूर्वक विदा किया।
अगले मरीज़ वही बुज़ुर्ग थे, जो कुछ देर पहले मुझे भगवान कह रहे थे। जाँच से ज्ञात हुआ कि वे सायकोसिस से पीड़ित हैं। सायकोसिस—a मानसिक स्थिति, जिसमें व्यक्ति अल्पकालिक अर्धविक्षिप्तता से ग्रसित होता है और वास्तविकता का बोध खो देता है।
निश्चित ही ‘भगवान’ होने के वे शब्द अर्धविक्षिप्तता की अवस्था में बोले गए थे, और मेरे मन को लगभग विक्षिप्त करते हुए मुझे ईश्वरत्व की यात्रा पर ले गए थे। लोग तो पत्थर को भी भगवान मान लेते हैं—यह अलग बात है कि पत्थर स्वयं को भगवान नहीं मानता, क्योंकि पत्थर को सायकोसिस नहीं होता।
थोड़ी देर के लिए ही सही, मुझे सायकोसिस हुआ था—और मैं सत्य से अनभिज्ञ होकर स्वयं को भगवान मान बैठा था।
सत्य यही है कि वह शक्ति तो ऊपरवाला ही है—मैं तो मात्र निमित्त हूँ। यह ‘निमित्त’ मैं नहीं होता, तो कोई और होता। अब मैं मास्क के पीछे से अपनी मूर्खता पर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।
Comments ( 4)
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Priya Saboo
10 months agoToo good 👍 👌 kripya likhtae rahae hamae intjar rahaega.
ishies
10 months agobeautiful story papa ❤️
Dinesh Kaushik
10 months agoबहुत ही दिल को छू लेने वाली कहानी या यू कहूं कहानी से ज्यादा हकीकत।
Pankaj Ajmera
10 months agoयह सत्य है कि मनुष्य कई बार वास्तव में सायकोसिस की दशा में चला जाता है और अपने आप को ईश्वर समझने लगता है, आपने इस लघु कथा के माध्यम से ईश्वर तत्व का सही बोध करवाया है। आपको इस प्रयास के लिए साधुवाद...🙏🙏🙏