बाढ़ में डूबकर भी कैसे तरें-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 15, 2025 व्यंग रचनाएं 6

बाढ़ आई नहीं कि सरकारी महकमें ‘आपदा प्रबंधन’ में ऐसे सक्रिय हो गए जैसे ‘मनौती’ पूरी हो गई हो। नदी उफनी नहीं कि पोस्टर लग गए, हेलिकॉप्टर उड़ गए, और राहत की थैलियाँ गिरने लगीं। मगरमच्छ तक घरों में घुस आए और मंत्रीजी बोले—“हर घर नल-जल योजना अब पूरी हो चुकी है।” प्रेस कांफ्रेंस में ठंडा पिलाकर सवाल बंद करवाना ही शायद सरकार का असली राहत प्रबंधन है।

गिरने में क्या हर्ज़ है-किताब समीक्षा-प्रभात गोश्वामी

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 15, 2025 Book Review 3

डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ न केवल भाषा की रवानगी दिखाता है, बल्कि विसंगतियों की गहरी पड़ताल भी करता है। समकालीन व्यंग्य की धारा में यह संग्रह एक उम्मीद की रेखा खींचता है।

जीवन पर प्रकाश डालिए-हास्य व्यंग्य रचना

Pradeep Audichya Jul 14, 2025 व्यंग रचनाएं 4

सेठजी को अब ‘सेठ’ होने से संतोष नहीं, उन्हें ‘समाजसेवी’ भी बनना है—वो भी बिना समाज की सेवा किए! अखबार, होर्डिंग, माला और माइक की व्यवस्था है, गाय तक बुलवाई गई है फोटो के लिए। जीवन पर प्रकाश डालते मास्टर साहब बिजली चोरी, मंदिर पर कब्ज़ा और गरीबों की "सुरक्षा" के किस्से खोल देते हैं। मुनीम तुरंत टोका — “अब ज्यादा प्रकाश ठीक नहीं है।”

“Roses and Thorns” : मेरी एक नई तीखी-मीठी उड़ान!

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2025 Blogs 0

Roses and Thorns – a satire bouquet straight from the OT (Operation Theatre) of an orthopedic doctor turned wordsmith. No enlightenment. No “6-pack abs” philosophy. Just full-blown prep to shake your brainstem and tickle your funny bone. 👉 From viral buffaloes to potholes with divine ambitions, every chapter is a comic detonation with a side of social X-rays. You may spot a few fractures in society that no scan could detect – but satire can.