“AI हर जगह है” — एक व्यंग्य

Wasim Alam Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है, इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है। AI जवाब दे रहा है— पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।

जब बोले अटल बिहारी

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 24, 2025 People 0

यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।

 ‘समय के साये ’ : समय की कविताएं

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 22, 2025 Book Review 0

समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है। यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है। जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है। डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है। यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।

भूमिका के बहुरुपिये-Satire Humour

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 17, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।

जय छठ मैया! राष्ट्रभक्ति और प्रकृति उपासना का दिव्य पर्व

Prahalad Shrimali Nov 1, 2025 Poems 0

छठ पर्व केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पण का सामूहिक संकल्प है। यह लेख छठ मैया की भक्ति के माध्यम से स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्र प्रेम और जनकल्याण की भावना का संदेश देता है — जहां सूर्य उपासना के साथ-साथ देशभक्ति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

प्रेमी की कुण्डलियाँ -Premi ki kundaliyan

Mahadev Prashad Premi Sep 17, 2025 Book Review 0

यह संग्रह पाठकों को समर्पित है—उन सभी साहित्यप्रेमियों को, जो कविता को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर जीवन-सत्य का आईना समझते हैं। प्रस्तुत संकलन “महादेव प्रसाद ‘प्रेमी’ की कुण्डलियाँ” उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें छंद की गेयता और लय के माध्यम से नीति, हास्य, व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ का सहज चित्रण हुआ […]

काश दीवारें बोल उठतीं

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 15, 2025 हिंदी कविता 2

एक धनाढ्य व्यक्ति, जिसने माँ के लिए महल जैसा घर बनाया था, आज बेसुध विलाप कर रहा है। माँ की हल्की करवट पर जाग जाने वाली वही माँ, महल की ऊँची दीवारों में पुकारते-पुकारते खो गई। उसकी पीड़ा यही थी—“काश ये दीवारें बोल उठतीं।” यह कहानी महज़ शोक नहीं, आधुनिक सुविधाओं में खोई मानवीय संवेदनाओं और मौन की त्रासदी का सजीव प्रतीक है।

कुण्डलियों की विरासत : महादेव प्रसाद ‘प्रेमी’ का संग्रह

Mahadev Prashad Premi Sep 4, 2025 Book Review 3

यह संग्रह महादेव प्रसाद ‘प्रेमी’ की कुण्डलियों का संकलन है, जिसे डॉ. मुकेश असीमित ने संपादित व प्रस्तुत किया है। इसमें प्रत्येक कुण्डली के साथ चित्रात्मक अभिव्यक्ति जोड़ी गई है। यह प्रयास लोकविधा कुण्डलिया को पुनर्जीवित करते हुए पाठकों तक उसकी लय, रस, हास्य और नीति का संपूर्ण अनुभव पहुँचाता है।

“महारास: राधा–कृष्ण की लीलाओं में कवियों का अमर रस”

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 29, 2025 Art and Craft 4

गणेश झांकी में महारास का आयोजन बचपन की रासलीला की याद दिला गया। परंपरागत पदावली और छंदों की जगह आज डीजे और पैरोडी ने ले ली है। सोचिए—यदि रसखान, नंददास, कुम्भनदास और घनानंद के पद फिर मंचित हों, तो कैसा दिव्य वातावरण बनेगा। इन कवियों ने भक्ति, प्रेम, श्रृंगार और विरह के रंगों से रासलीला को अमर और अनंत माधुरी का अनुभव बना दिया है।