चौबे जी हो गये डब्बे जी-आरोप, गाली और गले मिलन की व्यंग्य गाथा
लोकतंत्र, राजनीतिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और पंचायत की अराजकता पर आधारित डॉ. राम कुमार जोशी का तीखा एवं हास्यपूर्ण हिंदी व्यंग्य।
लोकतंत्र, राजनीतिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और पंचायत की अराजकता पर आधारित डॉ. राम कुमार जोशी का तीखा एवं हास्यपूर्ण हिंदी व्यंग्य।
"टैंकर देखकर प्यास बुझाओ" प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रदीप औदिच्य की एक मार्मिक और तीखी व्यंग्य रचना है, जिसमें ग्रामीण भारत की जल समस्या, सरकारी विभागों की लालफीताशाही, कागजी विकास, हैंडपंपों की दुर्दशा और फोटो-आधारित राजनीति पर करारा कटाक्ष किया गया है।
आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।
गंगापुर सिटी में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की साहित्यिक संगोष्ठी में ‘तत्वमसि’ उपन्यास, आत्मबोध, विश्वबोध और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर गहन चर्चा हुई। डॉ. मुकेश गर्ग ने उपन्यास की समीक्षा प्रस्तुत की।
“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”
“ऊर्जा स्वयं न पाजिटिव होती है न नेगेटिव—वह तो मात्र साधन है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे साधु साधे या ‘साहिब’ साधे।”
आनंदमठ केवल एक कथा नहीं, एक चेतना है—जहाँ भूख विद्रोह को जन्म देती है, भक्ति शक्ति में बदल जाती है और मातृभूमि एक भाव नहीं, एक पुकार बन जाती है। बंकिमचंद्र का यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल मानचित्र नहीं, त्याग और तपस्या से निर्मित एक जीवित अनुभव है।
फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?
“छंटे कुहासा, सूरज निकले, मन का हर अंधकार पिघले… नव विचारों के साथ यह संवत्सर केवल तिथि नहीं, बल्कि चेतना का एक नया उदय है।”
साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि मनुष्य के अनुभवों, संवेदनाओं और समाज की चेतना का जीवित दस्तावेज़ है। यह लेख साहित्य की अवधारणा, कला-संस्कृति और समाज से उसके संबंध तथा हिंदी साहित्य के प्रमुख वादों—छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता—को रोचक और प्रवाहपूर्ण ढंग से समझाता है।