मैं तेरी ही कब हो गई-कविता रचना
“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”