डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 18, 2026
News and Events
0
The satirical collection “Antim Darshan Ka darshan shastra ” by Dr. Mukesh Aseemit was launched at the World Book Fair with literary warmth and intellectual vibrancy. The event brought together senior Hindi writers, satirists, critics, and readers, celebrating satire as a continuous worldview rather than a momentary literary event.
Prahalad Shrimali
Nov 20, 2025
हिंदी कविता
0
यह कविता भारत-जन के महा स्वरों की गूंज “वंदेमातरम्” से शुरू होकर राष्ट्रहित, देशभक्ति, असल–नकली देशप्रेम, मीडिया की गिरावट, आतंकी तत्वों की धूर्तता और नागरिक कर्तव्यनिष्ठा जैसे मुद्दों पर तेज़ और सीधी चोट करती है। व्यंग्य और राष्ट्रभाव का मेल इसे और प्रभावी बनाता है। यह रचना केवल भावुक नहीं—एक चेतावनी, एक संदेश और एक सख्त सामाजिक निरीक्षण भी है।
Prahalad Shrimali
Oct 20, 2025
हिंदी कविता
0
“बहती प्रकाश की ओर अगर है ज़िंदगी,
तो हर अंधकार भी एक पड़ाव मात्र है।
जो दीप भीतर जलता है — वही अमर है,
वही सत्य है, वही जीवन का उजास।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 16, 2025
व्यंग रचनाएं
0
लेखक और शॉल का रिश्ता उतना ही अटूट है जितना संसद और हंगामे का। शॉल ओढ़े बिना लेखक अधूरा, और सोहन पापड़ी के डिब्बे के बिना समारोह अधूरा। यह सम्मान की रीसायकल संस्कृति है—जहाँ शॉल अलमारी से निकलकर अगले कार्यक्रम में, और सोहन पापड़ी बारात तक पहुँच जाती है। लेखक झुकता है—पहले शॉल के बोझ से, फिर आयोजकों की विचारधारा की ओर।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
हिंदी कविता
0
बारिश की धीमी बूँदें जैसे प्रेम पत्र हों, जो धरती पर उतरते ही एक गीत बन जाएं। डॉ. मुकेश असीमित की कविता "बरसात की बूंदे" न केवल प्रकृति की कोमलता को दर्शाती है, बल्कि उसमें छिपे प्रेम, आत्मिक जुड़ाव और आशाओं को भी खूबसूरती से रचती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 13, 2025
Book Review
0
“In today’s democracy, it’s not votes but bar graphs that count.”
From buffaloes and NGOs to spreadsheets and spiritual records, “Numbers Speak” unveils how statistics are polished and presented as truth. Part of Roses and Thorns, this satire pierces through media hype and political spin with wit and bite—translated from Hindi with soul intact.
Vidya Dubey
Jul 7, 2025
हिंदी कविता
1
विद्या पोखरियाल की यह कविता "पत्थर हूं मैं" जीवन की विसंगतियों को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पत्थर कभी पूजित है, कभी ठुकराया गया। मंदिर, नदी, पहाड़ और रास्ते — हर स्थल पर उसका एक अलग अस्तित्व है। यह साधारण होते हुए भी असाधारण है।
Vidya Dubey
Jul 5, 2025
Poems
6
यह कविता स्त्री के संघर्ष, सहनशीलता और उसकी शक्तियों का गान है। माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, देवी — हर भूमिका में वह समाज की नींव है। वह कमजोर नहीं, संसार की रचयिता है। उसकी जात सिर्फ 'औरत' नहीं, एक सम्पूर्ण सृष्टि है। यही उसका आत्मघोष है: हां मैं एक औरत हूं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 28, 2025
Blogs
2
An inspiring glimpse into the journey of publishing three books — from Hindi satires to an English humor collection. Dr. Mukesh shares heartfelt anecdotes, challenges of self-publishing, and the joy of finally bringing "Roses and Thorns" to readers worldwide. Now available on Amazon, Flipkart, and Notion Press!