पुष्पक विमान से पुष्प वर्षा

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 14, 2026 व्यंग रचनाएं 0

शहर की टूटी सड़कों और बजबजाती नालियों के बीच जब नेताजी की छवि भी पैबंददार हो गई, तो समाधान आसमान से उतरा—हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा। फर्क बस इतना पड़ा कि फूल जनता पर कम और नालियों में ज़्यादा गिरे, मगर नेताजी की छवि पर चढ़ा नया प्लास्टर खूब चमक गया।

मोगली आज़म (लघु नाटिका)

Ram Kumar Joshi Dec 13, 2025 हिंदी लेख 2

“मुगल-ए-आज़म के आधुनिकीकरण पर आधारित यह व्यंग्य-नाटिका सोलहवीं सदी के ठाठ-बाट को इक्कीसवीं सदी की भोंडी आधुनिकता से टकराते हुए दिखाती है—जहाँ बादशाह का दरबार दारू, डांस, ड्रामा और डिजिटल विद्रोह में बदल जाता है।”

नेता जी का इंटरव्यू – हम झूटन के बाप

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 7, 2025 व्यंग रचनाएं 0

नेता जी का यह इंटरव्यू लोकतंत्र के नाम पर एक शानदार हास्य-नाट्य है। हर सवाल का जवाब वे इतनी आत्मा-तुष्ट गंभीरता से देते हैं कि सच्चाई उनसे सावधान दूरी बनाकर खड़ी रहती है। बेहतरीन व्यंग्य, तीखे संवाद और कैमरे के सामने झूठ की अग्निपरीक्षा—सब कुछ यहाँ मौजूद है।

जय भारत वंदेमातरम्!वंदेमातरम्!!

Prahalad Shrimali Nov 20, 2025 हिंदी कविता 0

यह कविता भारत-जन के महा स्वरों की गूंज “वंदेमातरम्” से शुरू होकर राष्ट्रहित, देशभक्ति, असल–नकली देशप्रेम, मीडिया की गिरावट, आतंकी तत्वों की धूर्तता और नागरिक कर्तव्यनिष्ठा जैसे मुद्दों पर तेज़ और सीधी चोट करती है। व्यंग्य और राष्ट्रभाव का मेल इसे और प्रभावी बनाता है। यह रचना केवल भावुक नहीं—एक चेतावनी, एक संदेश और एक सख्त सामाजिक निरीक्षण भी है।

मेरा कमरा मेरा सलाहकार

Vivek Ranjan Shreevastav Nov 19, 2025 व्यंग रचनाएं 0

कमरे में घुसते ही लगा जैसे पूरा देश भीतर उतर आया हो। छत ऊँचा सोचने का उपदेश दे रही थी, पंखा शोर मचाते हुए ठंडा दिमाग रखने को कह रहा था, घड़ी और कैलेंडर समय का महत्व जता रहे थे, जबकि हल्का पर्स भविष्य बचाने की सलाह दे रहा था। हर वस्तु अपने दोषों के साथ दर्शन बाँट रही थी—एक सचमुच का व्यंग्यमय गृह-संसद।

वोट का हाट बाजार-हास्य व्यंग्य रचना

Pradeep Audichya Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!” चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”

मुद्दों की चुहिया – पिंजरे से संसद तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।

National Sport of India: Expressing Khed

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 29, 2025 Humour 0

Today khed (regret) is everywhere—railways, politics, social media, even obituaries mistaken for wedding photos! Leaders cultivate votes with garlands and khed, newspapers sell ads with khed, and doctors, police, and babus hide behind khed while work rots in files. VIPs get instant condolences, while the aam aadmi gets seasonal sympathy during elections. Truly, in India, if nothing else works, at least khed will always be available on demand.

Certified Human: Only If You’re Somebody’s Man

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 28, 2025 Humour 0

In today’s world, simply being human isn’t enough—you must be somebody’s man. From jobs and promotions to ration and awards, everything belongs to those stamped as “our man.” Without a “man” tag, you’re just a number in the aam aadmi crowd. Whether rubbing noses, bowing flat, or squeezing into ribbon-cutting photos, the rules are clear: survival requires patronage. After all, licenses, favors, even tea—flow only to somebody’s man!

“Roses & Thorns” — a thought-provoking collection of satire by Dr. Mukesh Aseemit.

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 7, 2025 Book Review 2

Roses & Thorns by Dr. Mukesh Aseemit is a sharp, witty collection of satirical essays that slices through India’s socio-political absurdities. With the precision of an orthopedician, Aseemit dissects hypocrisy, education scams, political chaos, and everyday quirks through humor, irony, and poetic flair. Each essay stands alone, making satire approachable, relatable, and impactful—sometimes whimsical, often biting, but always thought-provoking and rooted in authentic cultural observation.