छतरियों के साये में-कविता रचना
बरसात की एक शाम, एक बूढ़ा अपनी बीमार पत्नी को लिए डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर खड़ा है। डॉक्टर छतरी देता है, पर बूढ़े की आँखों की बारिश नहीं रुकती। यह कविता सामाजिक विषमता, करुणा और आत्मचिंतन की सघन अनुभूति कराती है।
बरसात की एक शाम, एक बूढ़ा अपनी बीमार पत्नी को लिए डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर खड़ा है। डॉक्टर छतरी देता है, पर बूढ़े की आँखों की बारिश नहीं रुकती। यह कविता सामाजिक विषमता, करुणा और आत्मचिंतन की सघन अनुभूति कराती है।
इस कविता में सावन का रसभीना चित्र है—जहाँ झूले हैं, कजरी है, और बदरा की फुहारें हैं, वहीं किसी के पिया की दूरी आँखों में तड़प बनकर उतरती है। यह रचना सावन की सौंदर्याभिव्यक्ति और विरह के भाव का सुंदर संगम है।