अरावली पर्वतमाला: अन्तरात्मा है, इन्हें मीटरों में मत नापो
अरावली पर्वतमाला को केवल मीटरों में मापना, उसकी अन्तरात्मा को अनदेखा करना है। यह पहाड़ नहीं, जल, जीवन और जलवायु की जीवित अवसंरचना है।
अरावली पर्वतमाला को केवल मीटरों में मापना, उसकी अन्तरात्मा को अनदेखा करना है। यह पहाड़ नहीं, जल, जीवन और जलवायु की जीवित अवसंरचना है।
अरावली की अहमियत उसकी ऊँचाई में नहीं, उसके काम में है। सवाल यह नहीं कि पहाड़ी कितनी ऊँची है, सवाल यह है कि वह हमें क्या बचा रही है।अरावली को लेकर बहस दरअसल विकास और संरक्षण के बीच उस संतुलन की तलाश है, जो अक्सर नीति में खो जाता है और प्रकृति में दिखाई देता है।
छठ पर्व केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पण का सामूहिक संकल्प है। यह लेख छठ मैया की भक्ति के माध्यम से स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्र प्रेम और जनकल्याण की भावना का संदेश देता है — जहां सूर्य उपासना के साथ-साथ देशभक्ति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
भारत में हरियाली और विकास की बहस पुरानी है। अक्सर आर्थिक तरक्की के नाम पर पर्यावरण की अनदेखी होती रही है। पर यह टकराव अनिवार्य नहीं। सही नीतियों, जन-जागरूकता और पर्यावरण-संवेदनशील विकास मॉडल के ज़रिए हरियाली और तरक्की दोनों संभव हैं। स्कैंडिनेवियाई देश इसका उदाहरण हैं, और भारत में भी ऐसी संभावनाएं बन रही हैं।
नेताजी पिछले पांच साल में जब से विधायक की कुर्सी हथियाई है, तब से प्रकृति प्रेम दिखाने के जो भी तरीके हो सकते हैं वो सभी अपनाए हैं। बंजर पड़ी चरवाहे की भूमियों को अपने अधिग्रहण करके उनमे एक आलिशान फार्म हाउस बनवाया है . उसमें पाताल तोड़ सबमर्सिबल लगाकर उसके मीठे पानी से विदेशी […]