चाँद हो या..कविता रचना
इस कविता में एक रात का भावचित्र है — जहाँ चाँद नहीं निकला, फिर भी कोई और "चाँद सा" मौजूद है जो सबका ध्यान खींच रहा है। उसकी अदाएँ, शर्मीलापन, सौंदर्य और भावनाओं की सजीवता से पूरी महफिल रोशन है। वह निराशा के अंधेरे में भी एक दीपक सा जगमगा रहा है — शान-ए-महफिल बनकर।