बुरा जो देखन मैं चला
कबीर दास जी ने कहा था ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ सीधा सा अर्थ है कि दुनिया में बुराई ढूंढने निकलोगे तो शायद ही मिले, लेकिन अगर अपने अंदर झांकोगे तो पाओगे कि सबसे बड़ी बुराई तो हमारे भीतर ही विद्यमान है। पर आज का मनुष्य इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं। वह दुनिया को कोसता है, व्यवस्था को गाली देता है, पर अपने अंदर झाँककर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।
श्रीमान सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान सूनी पड़ी थी, जबकि ठीक सामने, ‘मॉडर्न मुखौटा एम्पोरियम’ में भीड़ ही भीड़ है ।
एक दिन मैं सच्चिदानंद जी से मिलने पहुँचा। दुकान के अंदर अलग अलग आकार प्रकार के आईने लटके हुए थे, जिन पर धूल की हल्की परत जम गई थी। सच्चिदानंद जी चश्मे के पीछे से किसी किताब का अध्ययन कर रहे थे, दुनिया की इस भीड़-भाड़ से कोसों दूर वे खुद से साक्षात्कार कर रहे थे।
मेरे पूछने पर कि व्यवसाय कैसा चल रहा है, उन्होंने गहरी सांस ली और एक तीखी, परन्तु शांत मुस्कान के साथ बोले, “आजकल लोगों को अपना चेहरा देखने से डर लगता है। वे आईने में नहीं, सेल्फी तक ‘फिल्टर’ में देखने के आदी हो गए हैं।”
सामने वाली दुकान में तरह-तरह के मुखौटे सजे थे। ‘सेल्फी-रेडी स्माइल’ वाला मुखौटा सबसे ज्यादा बिक रहा था, जो हमेशा एक जैसी, बिना दिल की चमकती हुई हंसी दिखाता। फिर था ‘सोशल मीडिया संजीदगी’ का मुखौटा, जिसे पहनकर लोग दुनिया को ज्ञान बाँटते नज़र आते, भले ही अंदर से खोखले हों। ‘कार्यालयीन कर्मयोगी’ का मुखौटा, ‘शादी-पार्टी में रिश्तेदारी का भाव’ वाला मुखौटा, और तो और छोटे-बड़े का भेद भाव हटाता मुस्कुराता मुखौटा भी खूब चलन में था। लोग बड़े चाव से अपने लिए वक्त जरूरत के हिसाब से उपयोग के लिए कई कई मुखौटे चुन रहे थे, उसे पहनते, देखते और संतुष्ट होकर ले जाते।
सच्चिदानंद जी ने बताया, “पहले लोग आते थे। आईने के सामने खड़े होते, अपने चेहरे पर पड़ रही झुर्रियों, आँखों के नीचे के काले घेरों, या फिर मन के भावों को निहारते। कभी शर्मिंदा होते, कभी खुश। अपने आप से मिलते, अपनी कमियाँ सुधारने का संकल्प लेते। अब तो लोग अपनी सच्चाई से ही भाग रहे हैं। असली चेहरा तो शायद याद ही नहीं रहता।”
यह विसंगति सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन गई है। हम सुबह उठते ही मुखौटे पहनना शुरू कर देते हैं। ऑफिस जाते वक्त ‘आदर्श कर्मचारी’ का मुखौटा, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ वाला मुखौटा, दोस्तों के बीच ‘हैप्पी-गो-लकी’ का मुखौटा। हमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि असली चेहरा कौन सा था, यह भूल रहे हैं। आईना दिखाने वाले को हम दुश्मन समझने लगते हैं, क्योंकि वह हमें हमारा वह रूप दिखा देता है, जिसे हमने कब का दफन कर दिया है।
खुद की सच्चाई से सामना सबसे डरावना काम है।
मुखौटों की इस दुकान ने एक नया धंधा खोल दिया है , ‘मुँह देखी बातों’ का। यहाँ हर मुखौटे के लिए एक प्री रिकॉर्डेड बातें भी हैं। ‘कैसे हो?’ के जवाब में ‘बढ़िया’ की रिकॉर्डिंग, ‘काम कैसा चल रहा है?’ के उत्तर में’ऑल इज वेल’ की आवाज। असलियत चाहे जो भी हो, मुखौटे और उसकी आवाज़ हमेशा लगभग एक जैसी रहती है। लोग इसी बनावटीपन में खुशी महसूस करते हैं। सच्चाई का सामना करने के लिए साहस चाहिए वह गुमशुदा है।
सच्चिदानंद जी की दुकान सूनी है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना है, “जिस दिन किसी का मुखौटा टूटेगा, जब उसे अपनी असलियत का अहसास होगा, तो वह जरूर यहाँ आएगा। शायद तब वह खुद से मिल पाएगा।”
आज भले समाज का यह सामान्य चरित्र बन गया है कि हम दिखावे की इमारत खड़ी करने में मशगूल हैं, जबकि भीतर से हम टूट रहे है। आईना हमें वास्तविकता से वाकिफ कर टूटने से बचा सकता है, लेकिन हमने तो मुखौटों के सहारे जीना सीख लिया है। सवाल यह है कि क्या हम कभी अपने वास्तविक चेहरे को देखने की हिम्मत जुटा पाएंगे? या फिर मुखौटों की यह भीड़ ही हमारी पहचान बनकर रह जाएगी? शायद, जब तक हम कबीर की उक्ति को अपने ऊपर लागू नहीं करेंगे, तब तक हम सच्चिदानंद जी की दुकान तक नहीं पहुँच पाएंगे। और तब तक, मुखौटे की दुकान की भीड़ बढ़ती ही जाएगी।
विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
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