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परिंदों के स्वर्ग प्रवास नाजिम वाला तालाब खंजन पक्षियों के कलरव से गुंजायमान -डॉ मुकेश गर्ग

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इस बार सदियों में खंजन पक्षियों के कलरव से भी आबाद रहा नाजिम तालाब

ये दुनिया प्राणियों और पक्षियों की विविधता से भरी पड़ी हुई हे और उस दुनिया का ही एक छोटा सा कोना है नाजिम बाले तालाब का जो की गंगापुर शहर में स्थित है यहाँ की पक्षियों की विविधता और हर वर्ष बढ़ रही प्रवासी पक्षियों की तादाद शहर वासियों और पर्यावरण प्रेमियों को एक सुकून दे रही है

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नाज़िम वाला तलाव में अपने प्रवास की दस्तक देते एक ऐसे ही पक्षी के बारे में बात करने वाले जो अपनी दुम (पूंछ ) को लगातार ऊपर निचे हिलाता ही रहता हे जी हा दोस्तों में बात कर रहा हु खंजन पक्षी के बारे में जिनका अंग्रेजी नाम Wagtail Bird है

इस बार मैंने सर्दियों के महीने में इसकी चार प्रकार की प्रजातियों को यहाँ Identify किया है और उनके रिकॉर्ड फोटोग्राफ लिए है

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खंजन पक्षी की सामान्य जानकारी :

खंजन पक्षी भारत के प्रसिद्र पक्षियों में से एक पक्षी हे खंजन पक्षी भारतीय साहित्य का एक चिरपरिचित और उपमेय पक्षी है। हिंदी में इसे धोबन भी कहा जाता है। पंजाब में इसे बालकटारा, बांग्ला में खंजन, आसाम में बालीमाटी और तिपोसी और मलयालम में वेल्ला वलकुलुक्की कहते हैं यह मोटासिलिडी (Motacillidae) कुल के मोटासिला (motacilla) वर्ग (genus) का पक्षी है जिसे अंग्रेजी में वैगटेल कहते हैं। यह सर्दी के मौसम में उत्तर की ओर से आकर सारे देश में फैल जाता है और गरमी आरंभ होते ही शीत प्रदेशों को लौट जाता है। यह छोटा सा चंचल पक्षी है। इसकी लंबाई ७ से ९ इंच तक होती है। देह लंबी तथा पतली होती है। यह पानी के किनारे बैठा अपनी पूँछ बराबर हिलाता रहता है।

इसके नेत्र हर समय चंचल रहते हैं जिसके कारण भारतीय कवि नेत्रों की उपमा खंजन से दिया करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी मानस में लिखा है :खंजन मुंज तिरीछे नैननि।

खंजन पक्षी उड़ते वक्त चिट्ट – चिट्ट की आवाज उत्पन करता हे।

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खंजन पक्षी के रोचक तथ्यों के बारे में जनकारी देना चाहता हु

1 खंजन एक मध्यम कद का बहुत ही चंचल पक्षी हे।

2 इस पक्षी का पूरा शरीर लम्बा और पतला होता हे।

3 ये पक्षी अक्शर आपको पानी के किनारे यानिकि झीलों , तालाबों , नदियाँ के किनारे घूमता रहता हे।

4 प्राचीन कवियों ने नेत्रों की उपमा इस पक्षी यानिकि खंजन पक्षी से दिया हे क्योकि इस पक्षी के नेत्र हमेंशा चंचल रहती हे।

5 इस पक्षी की सबसे बड़ी विशेषता ये हे की ये पक्षी अन्य पक्षी की तरह कूदकर नहीं बल्कि दौड़कर चलता हे।

6 मादा खंजन पक्षी करीब चार से सात अंडे देती हे जो चौड़े एवं अंडाकार होते हे और नर मादा साथ मिलकर अपने बच्चो का पालन पोषण करते हे।

7 . इस पक्षी का जीवनकाल करीब पांच से आठ साल तक होता हे।

खंजन पक्षी की रंग और स्वाभाव के आधार पर चार प्रजाति हे।

सफ़ेद खंजन पक्षी : (वाइट वैगटेल )

ये पक्षी करीब आठ इंच लम्बा होता हे जबकि वजन करीब 20 ग्राम के आसपास होता हे। अगर हम इस पक्षी के रंग के बारे में बात करे तो इस पक्षी का रंग चितकबरा होता हे ये पक्षी अक्शर झुण्ड में कीड़े – मकोड़े का शिकार करते हे। ये पक्षी खतरा महसूस होते हे उस स्थान से उड़ जाते हे और वापस भी आ जाते हे।

शबल खंजन पक्षी :

इस पक्षी को ममोला या कालकंठ भी कहा जाता हे ये अन्य पक्षी की तुलना में आकर में सहेज बड़ा और ज्यादा चितकबरा होता हे। नर और मादा एकसमान ही होते हे। ये भारतवर्ष का बारहमासी पक्षी हे ये पक्षी अकेले भी रहता और झुण्ड में भी पाए जाते हे।

भूरा खंजन पक्षी :

इसे खैरैया भी कहते हैं ज्यादातर ये पक्षी के किनारे अकेला ही पाया जाता हे गर्मियों के दौरान ये पक्षी स्वदेश लौट जाता हे और करीब मई से जून के बिच अंडे देते हे।

पीला खंजन पक्षी : (येलो वैगटेल )

पिले खंजन पक्षी को कई लोग पिनाकी ,पिल्किया के नाम से भी पहचानते हे। मध्यम आकर का ये पक्षी करीब सात इंच लम्बा होता हे। इस पक्षी के शरीर का निचला हिस्सा पिले रंग का होता हे। पिले रंग के खंजन पक्षी को खंजन पक्षी में सबसे सुन्दर पक्षी कहा जाता हे।

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आदत और वास :

ये सितम्बर अक्तूबर में आ जाते हैं और मार्च-अप्रैल में वापस चले जाते है। काफ़ी चंचल होते हैं। घने जंगलों में ये शायद ही नज़र आएं। अधिकतर ये दिनभर जलाशयों के किनारे या खेत-खलिहानों, पगडंडियों पर या मानव-आवास के बीच, गोशाला, घर के आंगन में आदि स्थानों पर लगातार अपनी दुम ऊपर-नीचे हिलाते हुए इधर-उधर कीड़ों-मकोड़ों के लिए दौड़ लगाते रहते हैं। यह दौड़कर चलता है, अन्य पक्षियों की भाँति फुदकता नहीं। खतरे का आभास मिलने पर उड़ जाता है किंतु थोड़ी ही दूर के बाद पुन: जमीन पर उतर आता है। इसकी उड़ान लहराती हुई होती है और उड़ते समय ‘चिट् चिट्’ जैसी बोली बोलता रहता है। सामान्यत: यह पक्षी दो चार की ही टोली में देखा जाता है किंतु गरमी आते ही जब वे अपने स्थायी स्थानों पहाड़ों की ओर लौटते हैं तो इनका एक बड़ा समूह बन जाता है। गर्मी और बरसात ये पहाड़ों पर या हिमालय की घाटियों में बिताते हैं। वहीं अंडे देते है और शरद ऋतु में इनका फिर से मैदानों और आबादी वाले क्षेत्रों में आगमन होता है। इस प्रकार ऋतु के अनुसार इतनी इतनी दूरियों का स्थानांतरण प्रकृति का एक आश्चर्यजनक चमत्कार ही कहा जाएगा। इस पक्षी को धोबिन भी कहा जाता है। कपड़े धोती महिलाओं के बीच खुद भी मज़े से टहलता रहता है। यह अत्यंत मधुर तान छेड़ता है।भोजन : यह छोटे-छोटे कीड़ों, मकोड़ों, मच्छरों और नम भूमि से इकट्ठा किए गए सूंड़ियों को अपना आहार बनाता है। कभी-कभी यह घास चरने वाले जानवरों द्वारा परेशान किए गए उड़ते कीड़े को भी पकड़ता है।

प्रजनन :

वसंत के समाप्त होते ही ये पक्षी पहाड़ों की ओर चले जाते हैं। वहीं, हिमालय की गोद में पत्थरों के कोटरों में मई से जुलाई के बीच यह अपना प्यालानुमा घोंसला बनाता है। घोंसला सूखी घास, जड़ें, दूब, और इसी तरह के कर्कटों से बना होता है। प्रजनन काल में नर कई मिनटों तक सुरीले गीत गाता है। इसके अंडों की संख्या साधारणतः 4-6 होती है। अंडे चौड़े-अंडाकार होते हैं। छोटे किनारे की तरफ़ नुकीले होते हैं। नर और मादा दोनों मिलकर अंडों की देखभाल करते हैं। चूजों को प्रायः कीड़े खिलाए जाते हैं। नर और मादा द्वारा संतानों को पाल-पोस कर यह इस लायक कर दिया जाता है कि वे वर्षा के समाप्त होते ही नीचे उतर आएं।

फोटोग्राफर- डॉ मुकेश गर्ग

बर्ड एंड वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर डायरेक्टर गर्ग हॉस्पिटल फाउंडर CEO फोतोकार्ट

Location- Shyaroli Bhairav Dham Gangapur city

All bird lovers, environment lovers, and nature lovers should visit this place once Inbox me for the detail of your plan for a birding trip to this place you can join me every Sunday morning from 7.30 to 9 AM

Location of Nazim Bala Talaab bypass road Gangapur city 322201

Dr Mukesh Garg bird and wildlife photographer Conservationist

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